क़ायनात अगर खिलाफ़ है रहने दो। मैं चिराग हूं यूं ही जलने दो। कोई बता दे इन्हें। मेरी दुश्मनी अंधेरों से है। फिजाओं को यूं ही बहने दो। - हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
437 कविताएं
4 कविताएं
2936 कविताएं