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सुनें, किश्वर नाहीद की ग़ज़ल : तू अश्क ही बन के मेरी आँखों में समा जा

काव्य डेस्क

Irshaad
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                                                  औरतों के एहसासात और जज़्बात को आधार बनाकर शायरी तो काफ़ी की गई, मगर सिर्फ़ मर्दों की नज़र से। लेकिन, नए दौर की शायरी में उपमहाद्वीप में एक ऐसी नारीवादी उर्दू शायरा का नाम उभरा, जिसने महिलाओं की तकलीफों, ख़ुशी, ग़म और मोहब्बत को अपने संवेदनशील शब्दों में बयां किया। यह शायरा हैं पाकिस्तान की किश्वर नाहीद जिन्हें लोग किश्वर आपा भी कहते हैं।

अविभाजित भारत में 1940 को यूपी के बुलंदशहर में पैदा हुईं किश्वर नाहीद ने बचपन में बंटवारे की त्रासदी को क़रीब से देखा। 1949 में उन्हें अपना आस-पड़ोस छोड़कर परिवार के साथ लाहौर जाना पड़ा था। विभाजन के वक़्त महिलाओं के साथ बलात्कार और अपहरण की घटनाओं की वो साक्षी रहीं। छोटी सी उम्र में देखे इस रक्तपात का किश्वर की ज़िंदगी पर गहरा असर हुआ। उनकी शायरी में जहां औरतों की छोटी-छोटी खुशियां और उनकी मोहब्बत है, तो वहीं उनकी ज़िंदगी से जुड़े मुद्दे भी हैं। 

पाकिस्तान और हिंदुस्तान में किश्वर नाहीद के प्रशंसकों की एक बड़ी तादाद है। दरअसल, नाहीद ने जितने बेबाक और पुरज़ोर तरीक़े से औरतों के मसलों को अपने अल्फ़ाज़ में पिरोया, उतना शायद किसी दूसरी शायरा ने तवज्जो नहीं दी। उन्हें हर औरत की परेशानी और रुकावटें अपनी महसूस होतीं हैं और उनके लिए उन्होंने न सिर्फ़ आवाज़ उठाई बल्कि सरकारों के ख़िलाफ़ सड़कों पर भी उतरीं।
8 वर्ष पहले
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