संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार के सौजन्य से गुरु-शिष्य परंपरा के अंतर्गत आसरा संस्था की ओर लोकनाट्य राहु रो रीण का मंचन किया गया। हाब्बी मानसिंह कला केंद्र जालग में यह प्रस्तुति पद्मश्री विद्यानंद सरैक के कुशल निर्देशन में तैयार की गई, जिसने दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया। आसरा संस्था के प्रभारी डॉ. जोगेंद्र हाब्बी ने बयान में बताया कि राहु रो रीण उपन्यास की कथा पर आधारित यह नाटिका करियाला शैली के झूलणे स्वांग की परंपरा में प्रस्तुत की गई है। इसमें झूलणा स्वांग और गराल्टू झूरी जैसी सिरमौर की विलुप्तप्राय लोक विधाओं का समावेश कर इसे सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध बनाया गया। लोकनाट्य में प्राचीन समय की बेठू प्रथा पर आधारित एक मार्मिक कथा को दर्शाया गया। कहानी के माध्यम से दिखाया गया कि शोभू के परदादा की ओर से लिया गया मात्र सौ रुपये का ऋण पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़ता गया और चौथी पीढ़ी तक उसे बंधुआ मजदूरी करने के लिए मजबूर होना पड़ा। स्वतंत्रता के बाद जब इस कुप्रथा का अंत हुआ, तब मिसरू लाला ने मधु ठाकुर को इस अमानवीय प्रथा का बोध कराया और शोभू को ऋणमुक्त कर सम्मानजनक रोजगार प्रदान किया। प्रस्तुति में संदीप, चमन, रामलाल, गोपाल, सरोज, अनु, बिमला, चिरंजी लाल, सुनील, अमीचंद, दिनेश, रवि, मुकेश और मनमोहन सहित अन्य कलाकारों ने अपने अभिनय से पात्रों को जीवंत कर दिया। संगीत पक्ष भी आकर्षण का केंद्र रहा। संदीप (ढोलक), रविदत्त (करनाल), सोहनलाल (शहनाई), विद्या दत्त (बांसुरी) और ओम प्रकाश (नगाड़ा) ने अपनी प्रस्तुति से माहौल को भावपूर्ण बनाया। हेमलता, मंगेश, प्रीति और रेखा ने भी लोक कलाकारों के साथ मिलकर कार्यक्रम को सफल बनाने में अहम भूमिका निभाई। इस अवसर पर दर्शकों ने लोकनाट्य की सराहना करते हुए कहा कि ऐसी प्रस्तुतियां न केवल लोक संस्कृति को जीवित रखने का कार्य करती हैं, बल्कि समाज को महत्वपूर्ण संदेश भी देती हैं।