फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मेरा गांव मेरी शान: 900 वर्षों की समृद्ध विरासत को संजोए है बरोदा गांव, आस्था और सौहार्द का केंद्र

शाहिल शर्मा Updated Mon, 20 Apr 2026 03:52 PM IST

सोनीपत जिले के गोहाना उपमंडल से करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित बरोदा गांव जितना पुराना है, उसकी संस्कृति की जड़ें भी उतनी ही गहरी हैं। परंपरा, प्रगति, शौर्य और सौहार्द का प्रतीक यह गांव क्षेत्र के सबसे पुराने गांवों में शुमार है। करीब 25 हजार की आबादी वाले इस गांव में दो पंचायतें बरोदा मोर और बरोदा ठुठान हैं, जिसमें सात हजार मतदाता हैं। प्रोफेसर चांद मोर ने बताया कि बरोदा गांव की स्थापना वर्ष 1086 ईस्वी में हुई थी। इस गांव के मूल निवासी कैथल जिले के नीमवाला गांव से यहां आकर बसे थे। मान्यता है कि दादा गोगड़ सिंह मोर ने इस गांव की नींव रखी थी। समय के साथ गांव का विस्तार हुआ और लगभग 400 वर्षों बाद यहां खासा गोत्र के लोग भी आकर बस गए, जिससे इसकी सामाजिक विविधता और मजबूत हुई। आजादी के बाद बरोदा की पहचान और महत्व को देखते हुए इसके नाम पर विधानसभा क्षेत्र का गठन किया गया। 900 वर्षों की समृद्ध विरासत को संजोए बरोदा आज भी अपने गौरवशाली इतिहास, देशप्रेम, आपसी भाईचारे और निरंतर विकास के लिए जाना जाता है। जितेंद्र खास ने बताया कि गांव में बाबा ढाब वाला और बाबा गोसाईं वाला मंदिर आस्था का प्रमुख केंद्र है। दोनों मंदिरों में प्रतिवर्ष दो बार मेला लगता है, जिसमें आसपास के गांवों के अलावा वे भी शिरकत करते हैं जो दूसरे देशों में बस गए हैं। ग्रामीणों का इस मेले के प्रति अटूट श्रद्धा है। इन मेलों का उद्देश्य मनोरंजन न होकर आपसी भाईचारा और सौहार्द को बढ़ाना होता है। यहां के मेले में खरीददारी नहीं होती, दंगल का आयोजन होता है। खान-पान भी बाहरी रेहड़ी पटरी वाला न होकर घर पर बना खीर और चूरमा होता है। गांववासी जाति-पाति का भेदभाव किये बिना इसे आपस मे बांटकर मंदिर परिसर में बैठकर खाते हैं। कृष्ण मोर ने बताया कि आजादी की लड़ाई में इस गांव का भी विशेष योगदान रहा, जिसे आज भी लोग याद करते हैं। गांव के 10 क्रांतिकारी जापान की जेलों में कैद थे। उसी दौरान नेताजी सुभाष चंद्र बोस जापान गए और आजाद हिंद फौज की स्थापना की, तब वहां जेलों में बंद बरोदा गांव के लोगों को भी रिहा किया गया। जेल से बाहर आकर वे सभी लोग आजाद हिंद फौज में शामिल हो गए और देश की आजादी के लिए लड़ाई लड़ी। आजाद हिंद फौज से लेकर अब तक यह जज्बा कायम है। राजेश मोर ने बताया कि आजादी की लड़ाई में भी अपना सर्वोच्च बलिदान देने में गांव के लाल पीछे नहीं रहे। गांव में देश के लिए शहीद होने वालों की भी कमी है। इस गांव के युवाओं ने भारतीय फौज में भर्ती होकर लगभग सभी लड़ाइयों में देश के लिए बलिदान दिया है। गांव के शहीदों में प्रमुख रूप से 1947 में न्यादर खासा, 1962 में कैप्टन जितेंद्र, 1965 में धर्म सिंह और 1999 के कारगिल युद्ध में सतबीर सिंह का नाम आता है। बरोदा मोर के सरपंच वजीर भाटिया और बरोदा ठुठान की सरपंच सीमा देवी बताती हैं कि बरोदा गांव के युवाओं ने विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढ़कर गांव का नाम रोशन किया। डॉक्टर से लेकर इंजीनियर और फौज से लेकर पुलिस में यहां के लोगों ने अपनी अलग पहचान बनाई। वर्तमान में पहलवान, खिलाड़ी, कवि, कलाकार, वकील, डॉक्टर व अन्य प्रोफेशन से जुड़े युवा गांव की शान में चार चांद लगा रहे हैं।

Latest

विज्ञापन

Recommended

विज्ञापन
Next
एप में पढ़ें