कारगिल युद्ध में देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों को न्योछावर करने वाले वीर जवानों की गाथाएं आज भी हर देशवासी के रोंगटे खड़े कर देती हैं। एसी ही एक अमर दास्तान रोहतक जिले के गांव मोखरा के रहने वाले जांबाज सैनिक नायक सुरेश कुमार मलिक की है। पत्नी सुलेखा बताती हैं कि चार दुश्मनों को मारने के बाद सिर में लगी गोली ने उनका जीवन ले लिया। राजपूत राइफल्स में तैनात नायक सुरेश कुमार 10 जुलाई 1999 को कारगिल की दुर्गम पहाड़ियों पर दुश्मनों से लोहा लेते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। शहादत के समय उनकी उम्र 32 वर्ष थी। शहादत के 26 वर्ष बीत जाने के बाद भी जब उनकी पत्नी सुलेखा अपने पति का जिक्र करती हैं तो उनकी आंखें नम हो जाती हैं। सुलेखा ने बताया कि वह अपने पति के सही-सलामत घर लौटने का इंतजार कर रही थीं। इससे पहले श्रीलंका में भी दुश्मनों से लड़ते हुए पांव में गोली खा चुके थे। इससे उभरे तो करगिल में चले गए। उन्हें पूरी उम्मीद थी कि जब वे युद्ध जीतकर घर आएंगे, तो उन्हें घर में नए मेहमान के आगमन की खुशखबरी मिलेगी। नियति को कुछ और ही मंजूर था। बेटी के जन्म से ठीक दो महीने पहले सुरेश कुमार देश की सुरक्षा करते-करते शहीद हो गए। पति के जाने के बाद सुलेखा के कंधों पर बेटी के पालन-पोषण की एक बड़ी जिम्मेदारी आ गई। कहा कि मेरे पति ने देश की सुरक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर किए थे। इसलिए मैंने अपनी बेटी का नाम भी सुरक्षा रखा। आज मुझे और मेरी बेटी को उनकी शहादत पर गर्व है।