एचएयू के पूर्व कुलपति प्रो.केएस खोखर ने कहा कि प्रदेश की खेती प्रवासी मजदूरों पर निर्भर होकर रह गई है। महंगे बीज, उर्वरकों और कीटनाशकों के अधिक प्रयोग से खेती की लागत बढ़ रही है। खाद्यान्न की गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है। इससे बचने और किसानों की आय बढ़ाने के लिए किसानों से सस्ती, टिकाऊ व वैज्ञानिक आधार पर जहरमुक्त खेती को अपनाना होगा। राय बहादुर डॉ. रामधन सिंह (आरडीएस) मेमोरियल ट्रस्ट ट्रस्ट की ओर से जाट धर्मशाला में कृषि को पुनर्जीवित कैसे करें विषय पर आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला में शनिवार कोबतौर मुख्य अतिथि संबोधित करते हुए पूर्व कुलपति प्रो. केएस खोखर ने कहा कि सबसे अधिक रोजगार देने वाले क्षेत्र खेती पर सरकारों का सबसे कम ध्यान है। खेती पर लगातार खर्च बढ़ रहा है लेकिन उस अनुपात में भाव नहीं मिल रहा है। इसी कारण देश में 36 प्रतिशत किसान खेती छोड़कर शहरों या दूसरे धंधों की ओर जा रहे हैं। उन्होंनेकहा कि डॉ. स्वामीनाथन ने किसानों के लिए खेती लाभकारी बनाने के लिए भाव तय करने का फार्मूला बताया था लेकिन सरकार इसे लागू नहीं कर रही। वर्ष 1975 के बाद सरकारी कर्मचारियों का वेतन 120 से 250 प्रतिशत तक बढ़ा है लेकिन इसी अवधि में कृषि उत्पादों की कीमतों में केवल 44 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई है। पिछले कुछ सालों में सरकार ने बड़े पूंजीपतियों के 16 लाख करोड़ रुपये माफ कर दिए जबकि किसानों के लिए फसलों की एमएसपी की वृद्धि बहुत कम है। पूर्व कुलपति प्रो. केएस खोखर ने किसानों और किसान संगठनों से खेती को बचाने के लिए एकजुट होने का अनुरोध किया।