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विलियम शेक्सपियर की कविता: सारी दुनिया एक रंगमंच है

काव्य डेस्क

Vishwa Kavya
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                                                  सारी दुनिया एक रंगमंच है, नर-नारी सब अभिनेता
सात अवस्थाएं जीवन की, सात अंकों के नाटक में
अपना-अपना खेल दिखाकर हर इनसान चला जाता।

दूध गिराता शिशु पहले रिरियाता मां की बांहों में,
मन मारे, बस्त लटकाये चींटी की फिर चाल से चलता
पढ़ने जाता सुबह-सवेरे उजले चेहरे वाला बच्चा,
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और फिर आशिक आहें भरता आता तपती भट्टी-सा
आँखों पर प्रेयसी की लिक्खी दर्द भरी ग़ज़लें गाता।
फिर आता है एक सिपाही, दढ़ियल, अड़ियल, कसमें खाता

लड़ जाता सम्मान की खातिर बात-बात पर,
पैनी दृष्टि, गोल तोंद लिए सूक्तियों का इक भण्डार
नये-नये उदाहरण देता, न्यायधीश फिर मंच सजाता
 

छटी अवस्था लेकर आती ढलक-ढलक जाती जुर्राबें
टांगें सूखी, नाक पे चश्मा, ढीला-ढीला पाजामा
मरदाना आवाज के बदले रह जाती जब शिशु-सी चीखें
आंखें धुंधली, दांत नदारत, स्वाद गए सब
इक पिंजर, जब रह जाता है।
इस अद्भुत, इस अहम इतिहास का
आ जाता है अन्तिम दृश्य,
फिर से बचपन लौट आता है।
3 वर्ष पहले
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