विज्ञापन

नोबल पुरस्कार से सम्मानित 'विस्लावा शिम्बोर्स्का' की चुनिंदा कविताएं

deepali agrawal

Vishwa Kavya
विज्ञापन
                                    
                     
                                                  यातनाएं

बदला कुछ भी नहीं
यह देह उसी तरह दर्द का कुआं है।
इसे खाना, सांस लेना और सोना होता है।
इस पर होती है महीन त्वचा
जिसके नीचे ख़ून दौड़्ता रहता है।
इसके दांत और नाख़ून होते हैं।
इसकी हड्डियां होती हैं जिन्हें तोड़ा जा सकता है।
जोड़ होते हैं जिन्हें खींचा जा सकता है।

बदला कुछ भी नहीं।
देह आज भी कांपती है उसी तरह
जैसे कांपती थी
रोम के बसने के पूर्व और पश्चात्।
ईसा के बीस सदी पूर्व और पश्चात्
यातनाएं वही-की-वही हैं
सिर्फ़ धरती सिकुड़ गई है
कहीं भी कुछ होता है
तो लगता है हमारे पड़ोस में हुआ है।

बदला कुछ भी नहीं।
केवल आबादी बढ़ती गई है।
गुनाहों के फेहरिस्त में कुछ और गुनाह जुड़ गए हैं
सच्चे, झूठे, फौरी और फर्जी।
लेकिन उनके जवाब में देह से उठती हुई चीख
हमेशा से बेगुनाह थी, है और रहेगी।

बदला कुछ भी नहीं
सिवाय तौर-तरीकों, तीज-त्यौहारों और नृत्य-समारोहों के।
अलबत्ता मार खाते हुए सिर के बचाव में उठे हुए हाथ की मुद्रा वही रही।
शरीर को जब भी मारा-पीटा, धकेला-घसीटा
और ठुकराया जाता है,
वह आज भी उसी तरह तड़पता ऐंठता
और लहूलुहान हो जाता है।

बदला कुछ भी नहीं
सिवाय नदियों, घाटियों, रेगिस्तानों
और हिमशिलाओं के आकारों के।
हमारी छोटी-सी आत्मा दर-दर भटकती फिरती है।
खो जाती है, लौट आती है।
क़्ररीब होती है और दूर निकल जाती है
अपने आप से अजनबी होती हुई।
अपने अस्तित्व को कभी स्वीकारती और कभी नकारती हुई।
जब कि देह बेचारी नहीं जानती
कि जाए तो कहां जाए।

अनुवाद - विजय अहलूवालिया
विज्ञापन

तीन मुश्किल शब्द

जब मैं बोलती हूँ एक शब्द भविष्य
तो पहले अक्षर जुड़ते हैं
बीते हुए समय से

जब मैं बोलती हूँ खामोशी
मैं इसे नष्ट करती हूँ

जब मैं कहती हूँ कुछ नहीं
मैं कुछ ऐसा बनाती हूं
जिसे कोई अपने हाथों में नहीं रख सकता.

अनुवाद: विशाल श्रीवास्तव
6 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anita Chaturvedi

181 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10278 कविताएं

View Profile