विज्ञापन

विश्व काव्य: गुंटर कुनेर्ट, नींद-अचानक खुल पड़ी खिड़की... 

काव्य डेस्क

Vishwa Kavya
विज्ञापन
                                    
                     
                                                  जर्मनी के बड़े लेखक और कवि गुंटर कुनेर्ट ने डेमोक्रेटिक रिपब्लिक शासन की बजाय फेडरल रिपब्लिक शासन व्यवस्‍था को पसंद किया था। इनका जन्म 6 मार्च 1929 को हुआ था। इन्होंने संघीय शासन को तरजीह दी। कुनेर्ट स्वतंत्रता के लिए अधिकार की बजाय कर्त्तव्य की बात कहते हैं। 

नींद...

तुम देख रहे हो
शताब्दी का सपना
जब तुम सपने में देखते हो
प्रशासकीय छायाओं को
वे कभी कोई चेहरा नहीं दिखातीं
सिर्फ वहीं प्रशासकीय शक्ल
और हरकतें
पिछले कई अनुभवों के कारण
परिचित
वे दिखाती हैं तुम्हें
तुम्हारा आतंक और उनका डर
टिखटियां
पेट की परत के आर-पार और उम्मीद
तुम्हारे देश की जमीन में
गहरे गाड़ी गई
उस लम्हे पर तुम भागना चाहते हो
कम से कम जाग पड़ना चाहते हो लेकिन
अगर ऐसा हो
तो तुम पाओगे कि तुम्हारा बिस्तर बहुत पहले से घेर लिया गया है
क्योंकि शताब्दी का सपना
एक नहीं है

 
विज्ञापन

अचानक खुल पड़ी खिड़की...

अब भी आकाश में कहीं रोशनी नहीं। धुंआ
चारो तरफ। बाहर बजरी पर 
कोई एक
पहचान मुश्किल, कुहारे में लिपटा
और धुंध में 
खटखटाता है काले, चिटकी लकड़ी के 
तुम्हारे दरवाजे को
और अगर पूछो कि क्‍या नाम है उसका
जो तुम्हारे दरवाजे पर दस्तक देता, कोई बोलेगा
वहीं जिसे तुमने जिंदगी से बाहर फेंक दिया था
कचरे की तरह
जिसे उडेल आए थे
बासी धोवन की तरह
जिसे तुमने चुपचाप सूख जाने दिया
नील कुसुम की तरह तपती
दोपहरी में 
वह जो हमेशा मृतप्राय, हमेशा लौटता हुआ
मुझे कहते हैं सचाई
कोई नहीं रोक पाता मुझे, न यह लकड़ी का
तुम्हारा दरवाजा, न तुम्हारे कमरे का दरवाजा
न तुम्हारे मांस की चमड़ी, न ही 
तुम्हारे मस्तिष्क पर हड्डी की छत
मैं अंदर आ रहा हूं
जैसे सुबह
जैसे दिन जिसे कोई नहीं रोक सकता 
आने से 

अंग्रेजी से अनुवाद कुंवर नारायण
जर्मन से अनुवाद विष्‍णु खरे
साभार-पुनर्वसु
संपादक-अशोक वाजपेयी
विश्व कविता से एक चयन 
राजकमल प्रकाशन 
 
8 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Nidhhi Mukesh

22 कविताएं

View Profile

Sarthak Piyush

28 कविताएं

View Profile