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जन्मदिन विशेष, पाब्लो नेरूदा: चाँद चमकता है रोशनाई की तरह आवारा पानी पर...

काव्य डेस्क

Vishwa Kavya
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                                                  20वीं सदी के महानतम कवियों में शुमार पाब्लो नेरूदा का जन्म 12 जुलाई 1904 में मध्य चीली के एक छोटे-से शहर पराल में हुआ था। नेरूदा को विश्व साहित्य के शिखर पर विराजमान करने में योगदान सिर्फ़ उनकी कविताओं का ही नहीं बल्कि उनके बहुआयामी व्यक्तित्व का भी था। 

नेरूदा सिर्फ़ एक कवि ही नहीं बल्कि राजनेता और कूटनीतिज्ञ भी थे। 1971 में नेरूदा को फ़्रांस में चिली का राजदूत नियुक्त किया गया। पाब्लो नेरूदा को 1971 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

ऐसी करता हूँ तुमसे प्रीत
जैसे गहरे चीड़ों के बीच सुलझाती है हवा ख़ुद को
चाँद चमकता है रोशनाई की तरह आवारा पानी पर
दिन एक-से भागते हैं एक-दूजे का पीछा कर
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आह ! अकेला ।

बर्फ़ पसर जाती है नाचते चित्रों जैसे
पश्चिम से फिसल आते हैं समुद्री पंछी
कभी-कभी एक जहाज़ । ऊँचे-ऊँचे तारे ।
एक स्याही को पार करता जहाज़
आह ! अकेला ।

ऐसी करता हूँ तुमसे प्रीत

अकसर मैं उठ जाता हूँ पौ फटते ही और मेरी आत्मा गीली होती है
दूर सागर ध्वनित-प्रतिध्वनित होता है
अपने बंदरगाह पर ।

ऐसी करता हूँ तुमसे प्रीत
ऐसी करता हूँ प्रीत और क्षितिज छिपा लेता है तुम्हें शून्य में
इन सब सर्द चीज़ों में रहते करता हूँ तुमसे अब भी प्रेम
अकसर मेरे चुम्बन उन भारी पोतों पर लद जाते हैं
जो समुद्र को पार करने चल पड़े हैं, बिना आगमन की संभावना के
और मैं पुराने लंगर-सा विस्मृत पड़ा रहता हूँ

घाट हो जाते हैं उदास जब दोपहर बँध जाती है आकर
मेरा क्षुधातुर जीवन निरुद्देश्य क्लांत है
मैंने प्यार किया, जिसे कभी पाया नहीं । तुम बहुत दूर हो
मेरी जुगुप्सा लड़ती है मंथर संध्या से
और निशा आती है गाते हुए मेरे लिए

चाँद यंत्रवत अपना स्वप्न पलटता है
और तुम्हारी आँखों से सबसे बड़ा सितारा टकटकी लगाए देखता है मुझे
और क्योंकि मैं करता हूँ तुमसे प्रीत
हवाओं में चीड़ तुम्हारा नाम गुनगुनाते हैं
अपने पत्तों की तंत्री छेड़ते ।

अँग्रेज़ी से अनुवाद : अपर्णा मनोज

अगर तुम मुझे भूल जाओ 

अगर तुम मुझे भूल जाओ 

मैं चाहता हूँ कि तुम 
एक चीज़ जान जाओ।  


तुम जानते हो ये कैसा है :
अगर मैं देखता हूँ 
उस स्फटिक चाँद को , उस मद्धम पतझड़ के 
लाल डाल को अपनी खिड़की पे,
अगर मैं छूता हूँ 
आग के करीब 
अस्पृश्य राख को 
या झुर्राए लकड़ी के कुंदे के देह को, 
सब कुछ मुझे तुम्हारी ओर ले जाता है, 
जैसे सब कुछ जो है, 
गंध, रोशनी, धातु, 
छोटी कश्तियाँ हैं 
जो निकल पड़ी हैं 
तुम्हारे उन द्वीपों की ओर जो मेरा इंतज़ार करती हैं।  


ख़ैर, अब,
अगर ज़रा ज़रा करते तुम मुझे प्यार करना बंद कर दोगी 
मैं तुम्हें प्यार करना बंद कर दूँगा ज़रा ज़रा करते। 

तुम भुला दोगी मुझे 

अगर अचानक 
तुम भुला दोगी मुझे 
तो खोजना मत मुझे 
क्यूँकि मैं पहले ही तुम्हें भूल चुका होउंगा। 

अगर तुम इस पे पागलपन से कुछ देर सोचो,
ध्वजा सी हवाएँ 
जो मेरी ज़िन्दगी से होके गुज़रती हैं,
और तुम तय कर लो 
मुझे उस दिल के किनारे छोड़ने का 
जहाँ मेरी जड़ें हैं,
कि उस दिन,
उस घड़ी,
मैं अपनी बाहें उठाऊँगा  
और मेरी जड़ें निकल जाएँगी 
कोई दूसरी ज़मीन ढूँढने। 

आह मेरे प्रिय, आह मेरे अपने

लेकिन 
अगर हर दिन 
हर घड़ी, 
तुम्हें लगे कि तुम मेरे लिए ही हो 
अडिग मिठास लिए, 
अगर हर दिन एक फूल 
तुम्हारे होठों तक चढ़ के मुझे ढूंढे, 
आह मेरे प्रिय, आह मेरे अपने, 
मुझमें वो आग दोहराएगी, 
मुझमें कुछ बुझेगा नहीं, भूलेगा नहीं, 
मेरा प्यार तुम्हारे प्यार पे जीता है, मेरे मेहबूब, 
और जब तक तुम ज़िंदा हो, वो तुम्हारी बाँहों में होगा 
बिना मेरी बाहों को छोड़े। 

अनुवाद : अरविन्द जोशी 
8 वर्ष पहले
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