आज एक बड़ा तबका बहुत मौन है...
नहीं बताना चाहते वे किसी को,
कि गाँधी कौन है?
हिंसा गोड्से की सर्वत्र परिलक्षित है,
गाँधी चौराहे-चौराहे मर रहे,
हिंसा सुरक्षित और
अहिंसा बहुत गौण है
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आरोप-प्रत्यारोप के झंझावातों से लड़ रहे,
वे मर के भी
अपनों से अहिंसा की बात कर रहे,
अजीब हालात में हैं गाँधी,
वे किस-किस गोड्से से कहें,
कि हिंसा छोड़ दो !
हे राम !
बड़ा मुश्किल वक़्त और दौर है,
शायद साबरमती का संत अब इस देश में,
असहाय और निरुपाय हो गया है,
वे लाठी टेके थक गया है,
गोली मार दो नाथु,
हिंसा विजयी हो
और मौन हो जाये गाँधी कह के
हे राम !
रंगनाथ द्विवेदी की फेसबुक वाल से साभार