मेरी कविता को सहारे की
ज़रूरत है क्यूंकि
यह कुछ दिनों से
दंगों की दर्द विशाराद तस्वीरें देखकर स्तब्ध है
वो रोना चाहती है
चीखना चाहती है
पर आंसूओं के शहर में भीषण सूखा पड़ गया है
आवाज़ों की ज़मीन पर दरारें पड़ गई हैं
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छटपटाहट की हालत में
गुस्से में कलम से काग़ज़ को चीर देती है
दु:खी ख़यालों को झकझोरती है
ख़यालों पर नमी है मौन की
लफ़्ज़ों पर फफूंद पड़ गए हैं
ज़बानें सूख चुकी हैं
शब्द बेहोश हो जाते हैं
ऐसे में मेरी कविता आजकल
कंधा तलाश रही है
जब मेरे साथी ज़ाहिर करते हैं
जलती इंसानियत पर अपना दु:ख
मेरी कविता उनके अल्फ़ाज़ों में
भावनात्मक आश्रय खोजती है
अभी-अभी एक साथी लेखक की
कविता पढ़ कर मेरी कुंठित कविता
फूट फूट कर रोई है
आखिर एक कविता ही एक कविता का
हाथ थाम कर ढांढस बंधा सकती है
और हिम्मत के शब्दों से दे सकती है
एक मज़बूत छत और एक कम्बल
आग में जलती
इंसानियत को !
संयोगिता मिश्रा की फेसबुक वाल से साभार