दुनिया में कहीं न कहीं
कुछ न कुछ ऐसा घट रहा है
जो वक़्त-बेवक्त पहुँच ही जाएगा यहाँ तक।
सर्द हवाएं चली आएंगी बसंत के फूलों को बर्बाद करने
या शायद गर्मी उन्हें झुलसाने आ जाए।
बिना कागजात, बिना पासपोर्ट आ जाएगा कोई वायरस
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और धर दबोचेगा मुझे
जब मैं मिला रही होऊंगी किसी से हाथ
या चूम रही होऊंगी कोई गाल
कहीं न कहीं शुरू हो चुका है कोई छोटा सा झगड़ा
कुछ तीखे और कड़वे शब्दों ने
लगा दी है आग
और आने लगी है
धुएं की बू
आने लगी है किसी युद्ध की बू
जहां भी मैं जाती हूं खटखटा कर देखती हूं
लकड़ी को
मेजों को
या पेड़ के तनों को
बार-बार धोती हूँ अपने हाथ
नजर दौड़ाती हूँ अखबारों पर
और बनाती हूं चेतावनी के निशान
जो मेरे या मेरे पति की जन्म तारीख़ से नहीं हैं
मगर कहीं न कहीं, कुछ न कुछ घट रहा है ऐसा
जिसके ख़िलाफ़ कोई तैयारी नहीं है
सिर्फ वही दोनों बचे हुए हैं हर तैयारी में
जर्जर उम्मीद और बूढ़ी किस्मत।
अमेरिकन कवयित्री लिंडा पास्तन की कविता
अनुवाद: मनोज पटेल
साभार: पढ़ते पढ़ते ब्लाॅग