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वसीम बरेलवी की ग़ज़ल: मिली हवाओं में उड़ने की वो सज़ा यारो

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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                                                  मिली हवाओं में उड़ने की वो सज़ा यारो 
कि मैं ज़मीन के रिश्तों से कट गया यारो 

वो बे-ख़याल मुसाफ़िर में रास्ता यारो 
कहाँ था बस में मिरे उस को रोकना यारो 

मिरे क़लम पे ज़माने की गर्द ऐसी थी 
कि अपने बारे में कुछ भी न लिख सका यारो 

तमाम शहर ही जिस की तलाश में गुम था 
मैं उस के घर का पता किस से पूछता यारो 
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जो बे-शुमार दिलों की नज़र में रहता था 
वो अपने बच्चों को इक घर न दे सका यारो 

जनाब-ए-'मीर' की ख़ुद-ग़र्ज़ियों के सदक़े में 
मियाँ 'वसीम' के कहने को क्या बचा यारो 

2 वर्ष पहले
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