वो छत भी गई सर से जो दुनिया थी हमारी
हम कौन सी दुनिया को बचाने में लगे थे
इस बरस उस से बिछड़ना था तो क्या क्या न हुआ
वर्ना कब इतनी मुलाक़ातें हुआ करती थीं
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वही तो हो गए दुश्मन इक दिन
जिन की बातों में नहीं आए हम
रूठ कर हम भी भूल जाते हैं
दूसरा भी नहीं मनाता है
तिरी तरह नहीं आसान वापसी मेरी
मैं रास्तों को समझता हुआ नहीं आया
इंतिहा तक बात ले जाता हूँ मैं
अब उसे ऐसे ही समझाता हूँ मैं
एक मुद्दत हुई घर से निकले हुए
अपने माहौल में ख़ुद को देखे हुए
हो सबब कुछ भी मिरे आँख बचाने का मगर
साफ़ कर दूँ कि नज़र कम नहीं आता है मुझे
तसल्ली अब हुई कुछ दिल को मेरे
तिरी गलियों को सूना देख आया
किस तरह आए हैं इस पहली मुलाक़ात तलक
और मुकम्मल है जुदा होने की तय्यारी भी
अभी तो अच्छी लगेगी कुछ दिन जुदाई की रुत
अभी हमारे लिए ये सब कुछ नया नया है
कैसे टुकड़ों में उसे कर लूँ क़ुबूल
जो मिरा सारे का सारा था कभी