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आयुष चराग़: दीदी भारत नहीं बल्कि सारे जग की रत्ना थीं

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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                                                  इस  बासंती ऋतु  में यह क्या  सूझा परम पिता को, 
सुरविहीन कर छोड़ गया प्राणों का विहग 'लता' को। 

दशकों जिसने गीत सुना कर सदियों की निधि दी है, 
विधि  ने  उसकी  क़ीमत  हम  सुननेवालों  से  ली है। 

यह  परलोक  गमन सब  के  सीने की टीस हुआ है, 
स्वर्ग  आज  धरती से  निश्चित ही इक्कीस हुआ है। 

हर  संगीत  साधिका  के  उर में  पलता सपना थीं, 
दीदी  भारत  नहीं  बल्कि  सारे  जग की रत्ना थीं। 

देखो  आ  इक  बार  अंततः  हुआ  वही कल्याणी, 
सारे  लोग  वतन  के  भर  लाये  आँखों  में  पानी। 
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स्वर कोकिले! प्रणाम आख़िरी बार तुम्हें जन जन का, 
चरणों   में  उद्गार   तरल   अर्पित  है  नयन नयन  का। 

मादकता,  माधुर्य,  मृदुलता की सिरमौर न होगी, 
यह हमको विश्वास लता कोई फिर और न होगी। 
4 वर्ष पहले
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