किसी को ध्यान ही आया न रुत बदलने का
था इंतिज़ार हर इक को हवा के चलने का
वही पुराने मुसाफ़िर मिले नई रह पर
था इफ़्तिख़ार हमें जिन से बच निकलने का
अब एक दूसरे को मुड़ के देखते भी नहीं
कभी था ज़ो'म बहुत साथ साथ चलने का
वो संग-दिल सही आग़ोश-ए-आरज़ू में मगर
हर एक पल उसे एहसास था पिघलने का
घिरा हुआ हूँ हिसार-ए-हयात में कब से
कोई भी रास्ता मिलता नहीं निकलने का
गिला नहीं कोई तुझ से निगाह-ए-नश्शा-ए-यार
मैं ख़ुद गिरा कि इरादा न था सँभलने का
तुलू'-ए-सुब्ह ख़ुदा जाने क्या समाँ लाए
लगा है शाम से धड़का सा रात ढलने का
विसाल-ए-यार में कब है फ़िराक़-ए-यार की बात
'अजीब लुत्फ़ है 'मोहसिन' वफ़ा में जलने का
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