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मलाज़ नक़वी: अब तो नहीं रहा मुझे ख़्वाबों पे ए'तिबार

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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अब तो नहीं रहा मुझे ख़्वाबों पे ए'तिबार


करने लगा हूँ जागती आँखों पे ए'तिबार

तुम को नहीं पता है कि क्या मो'जिज़ा हुआ
दरिया को हो गया है किनारों पे ए'तिबार

बैठे हैं धूप में वो चराग़ाँ किए हुए
होता नहीं है जिन को किताबों पे ए'तिबार

जब रास्ते ज़मीं के दिखाई न दें तुम्हें
इक बार कर के देखो सितारों पे ए'तिबार

डरने लगे हैं वक़्त के हाकिम बड़े बड़े
करने लगे हैं लोग सवालों पे ए'तिबार

कोई 'मलाज़' अपना निगहबाँ नहीं रहा
करते रहेंगे अपनी ही ग़ज़लों पे ए'तिबार हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।

एक महीने पहले
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