अब लगने लगी मुझ को भी बे-कार ये दुनिया
हर मोड़ पे जैसे कि हो दीवार ये दुनिया
डरते हैं इसी बात से हम अहल-ए-वफ़ा लोग
हम को न समझ ले कहीं ग़द्दार ये दुनिया
सींची है ज़मीं लोगों ने बच्चों के लहू से
इस बात से कैसे करे इंकार ये दुनिया
इंसाफ़ न मिलने पे भी ये रहती है ख़ामोश
है काफ़ी दिनों से बड़ी बीमार ये दुनिया
मैं देखता हूँ जब किसी अख़बार की जानिब
लगता है कि लाशों का है बाज़ार ये दुनिया
बरसों से वहाँ उठती हैं चीख़ों की सदाएँ
कर आई थी जो घर कभी मिस्मार ये दुनिया
फूलों की तरफ़ बढ़ने की हिम्मत नहीं करते
दे देती है जिन हाथों में हथियार ये दुनिया
ज़ालिम की तरफ़-दारी में मसरूफ़ है हर दम
ऐ काश हो मज़लूम की ग़म-ख़्वार ये दुनिया
क्यूँ उस की ही राहों में बिछा देती है काँटे
जिस शख़्स से करती है बहुत प्यार ये दुनिया
ये बात 'मलाज़' आप को रखना है सदा याद
खा जाती है अच्छे-भले फ़नकार ये दुनिया
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