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मख़दूम मुहिउद्दीन: तुम गुलिस्ताँ से गए हो तो गुलिस्ताँ चुप है

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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                            तुम गुलिस्ताँ से गए हो तो गुलिस्ताँ चुप है
        
                                                    
                            
शाख़-ए-गुल खोई हुई मुर्ग़-ए-ख़ुश-इल्हाँ चुप है

उफ़ुक़-ए-दिल पे दिखाई नहीं देती है धनक
ग़म-ज़दा मौसम-ए-गुल अब्र-ए-बहाराँ चुप है

आलम-ए-तिश्नगी-ए-बादा-गुसाराँ मत पूछ
मय-कदा दूर है मीना-ए-ज़र-अफ़शाँ चुप है

और आगे न बढ़ा क़िस्सा-ए-दिल क़िस्सा-ए-ग़म
धड़कनें चुप हैं सरिश्क-ए-सर-ए-मिज़्गाँ चुप है

शहर में एक क़यामत थी क़यामत न रही
हश्र ख़ामोश हुआ फ़ित्ना-ए-दौराँ चुप है

न किसी आह की आवाज़ न ज़ंजीर का शोर
आज क्या हो गया ज़िंदाँ में कि ज़िंदाँ चुप है
 
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8 महीने पहले
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