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कैफ़ भोपाली: ज़िंदगी शायद इसी का नाम है दूरियाँ मजबूरियाँ तन्हाइयाँ

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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                                                  हाए लोगों की करम-फ़रमाइयाँ 
तोहमतें बदनामियाँ रुस्वाइयाँ 

ज़िंदगी शायद इसी का नाम है 
दूरियाँ मजबूरियाँ तन्हाइयाँ 

क्या ज़माने में यूँ ही कटती है रात 
करवटें बेताबियाँ अंगड़ाइयाँ 

क्या यही होती है शाम-ए-इंतिज़ार 
आहटें घबराहटें परछाइयाँ 
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एक रिंद-ए-मस्त की ठोकर में हैं 
शाहियाँ सुल्तानियाँ दाराइयाँ 

एक पैकर में सिमट कर रह गईं 
ख़ूबियाँ ज़ेबाइयाँ रानाइयाँ 

रह गईं इक तिफ़्ल-ए-मकतब के हुज़ूर 
हिकमतें आगाहियाँ दानाइयाँ 

ज़ख़्म दिल के फिर हरे करने लगीं 
बदलियाँ बरखा रुतें पुरवाइयाँ 

दीदा-ओ-दानिस्ता उन के सामने 
लग़्ज़िशें नाकामियाँ पसपाइयाँ 

मेरे दिल की धड़कनों में ढल गईं 
चूड़ियाँ मौसीक़ियाँ शहनाइयाँ 

उन से मिल कर और भी कुछ बढ़ गईं 
उलझनें फ़िक्रें क़यास-आराइयाँ 

'कैफ़' पैदा कर समुंदर की तरह 
वुसअतें ख़ामोशियाँ गहराइयाँ 
4 वर्ष पहले
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