रास्ते क़हक़हे लगाने लगे
वापसी का मज़ा नहीं आया
~ अदनान नसीर
तुम्हारा गाँव आएगा सफ़र में
सो खिड़की की तरफ़ बैठे नहीं हम
~ दीपेश शर्मा सौभरि
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इक मुद्दत का प्यासा ये कैसे समझे
दरिया के आगे भी रस्ता जाता है
~ दीपेश शर्मा सौभरि
सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहां
ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहां
~ ख़्वाजा मीर दर्द
यूं तो घर ही में सिमट आई है दुनिया सारी
हो मयस्सर तो कभी घूम के दुनिया देखो
~ जमील मलिक
सब कोहसार समुंदर सहरा घूमें उस के गिर्द 'रशीद'
वो इक शख़्स जो दुनिया-भर में तन्हा तन्हा रहता है
~ रशीद क़ैसरानी
दुनिया घूमे क्या क्या देखा
कोई न हम ने तुम सा देखा
~ सुलैमान जाज़िब
दुआ ये है न हों गुमराह हम-सफ़र मेरे
'ख़ुमार' मैं ने तो अपना सफ़र तमाम किया
~ ख़ुमार बाराबंकवी
वो इक सफ़र जो हमें ज़िंदगी की शक्ल मिला
उस इक सफ़र के कई मरहले बनाने पड़े
~ अज़्बर सफ़ीर
सफ़र तवील है इस का ख़याल मत करना
कि हर क़दम से सफ़र मुख़्तसर भी होता है
~ रुबीना अयाज़
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