एक सीता की रिफ़ाक़त है तो सब कुछ पास है
ज़िंदगी कहते हैं जिस को राम का बन-बास है
~ हफ़ीज़ बनारसी
जो सुनते हैं कि तिरे शहर में दसहरा है
हम अपने घर में दिवाली सजाने लगते हैं
~ जमुना प्रसाद राही
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है दसहरे में भी यूँ गर फ़रहत-ओ-ज़ीनत 'नज़ीर'
पर दिवाली भी अजब पाकीज़ा-तर त्यौहार है
~ नज़ीर अकबराबादी
क्या सितम करते हैं मिट्टी के खिलौने वाले
राम को रक्खे हुए बैठे हैं रावण के क़रीब
~ होश जौनपुरी
दर्द घनेरा हिज्र का सहरा घोर अंधेरा और यादें
राम निकाल ये सारे रावन मेरी राम कहानी से
~ सय्यद सरोश आसिफ़
अच्छों से पता चलता है इंसाँ को बुरों का
रावन का पता चल न सका राम से पहले
~ रिज़वान बनारसी
यहाँ लछमन की रेखा है न सीता है मगर फिर भी
बहुत फेरे हमारे घर के इक साधू लगाता है
~ राहत इंदौरी
'नज़्र' फिर आया है इक रस्म निभाने का दिन
सज सँवर के सभी रावन को जलाने निकले
~ नज़्र फ़ातमी
गुज़रा था अपने शहर से रावन फ़साद का
ज़ालिम मोहब्बतों की कथाएँ भी ले गया
~ फ़ारूक़ अंजुम
अन्याय ने भर दी है बहुत आग दिलों में
लंका ही कहीं इस में जो जल जाए तो अच्छा
~ आलोक यादव
राम वो वही रहमान हैं सभी मक़ाम उस के
मुख़्तलिफ़ ज़बानों में मुख़्तलिफ़ हैं नाम उस के
~ रवेन्द्र जैन
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