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Firaq Gorakhpuri shayari: फ़िराक़ के ख़ज़ाने से चुनिंदा शेर

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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                                                  उसी दिल की क़िस्मत में तन्हाइयाँ थीं 
कभी जिस ने अपना पराया न जाना 

दिलों को तेरे तबस्सुम की याद यूँ आई 
कि जगमगा उठें जिस तरह मंदिरों में चराग़ 

जिन की ता'मीर इश्क़ करता है 
कौन रहता है उन मकानों में
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तर्क-ए-मोहब्बत करने वालो कौन ऐसा जुग जीत लिया 
इश्क़ से पहले के दिन सोचो कौन बड़ा सुख होता था 

ज़ुल्मत ओ नूर में कुछ भी न मोहब्बत को मिला 
आज तक एक धुँदलके का समाँ है कि जो था 

'फ़िराक़' दौड़ गई रूह सी ज़माने में 
कहाँ का दर्द भरा था मिरे फ़साने में 

दुनिया थी रहगुज़र तो क़दम मारना था सहल 
मंज़िल हुई तो पाँव की ज़ंजीर हो गई 

तिरी निगाह से बचने में उम्र गुज़री है 
उतर गया रग-ए-जाँ में ये नेश्तर फिर भी 

चुपके चुपके उठ रहा है मध-भरे सीनों में दर्द 
धीमे धीमे चल रही हैं इश्क़ की पुरवाइयाँ 

जो ज़हर-ए-हलाहल है अमृत भी वही लेकिन 
मालूम नहीं तुझ को अंदाज़ हैं पीने के 

तारा टूटते सब ने देखा ये नहीं देखा एक ने भी 
किस की आँख से आँसू टपका किस का सहारा टूट गया 

क़फ़स वालों की भी क्या ज़िंदगी है 
चमन दूर आशियाँ दूर आसमाँ दूर 
2 वर्ष पहले
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