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Ahmad Nadeem Qasmi: कहीं वो मेरी मोहब्बत में घुल रहा ही न हो

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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कहीं वो मेरी मोहब्बत में घुल रहा ही न हो
ख़ुदा करे उसे ये तजरबा हुआ ही न हो

सुपुर्दगी मिरा मेआ'र तो नहीं लेकिन


मैं सोचता हूँ तिरे रूप में ख़ुदा ही न हो

मैं तुझ को पा के भी किस शख़्स की तलाश में हूँ


मिरे ख़याल में कोई तिरे सिवा ही न हो

वो उज़्र कर कि मिरे दिल को भी यक़ीं आए


वो गीत गा कि जो मैं ने कभी सुना ही न हो

वो बात कर जिसे फैला के मैं ग़ज़ल कह लूँ


सुनाऊँ शे'र जो मैं ने अभी लिखा ही न हो

सहर को दिल की तरफ़ ये धुआँ सा कैसा है


कहीं ये मेरा दिया रात-भर जला ही न हो

हो कैसे जब्र-ए-मशीयत को इस दुआ का लिहाज़


जो एक बार मिले फिर कभी जुदा ही न हो

ये अब्र-ओ-किश्त की दुनिया में कैसे मुमकिन है


कि उम्र-भर की वफ़ा का कोई सिला ही न हो

मिरी निगाह में वो पेड़ भी है बद-किर्दार


लदा हुआ हो जो फल से मगर झुका ही न हो

जो दश्त दश्त से फूलों की भीक माँगता था


कहीं वो तोड़ के कश्कोल मर गया ही न हो

तुलू-ए-सुब्ह ने चमका दिए हैं अब्र के चाक


'नदीम' ये मिरा दामान-ए-मुद्दआ' ही न हो

2 वर्ष पहले
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Pankaj Sharma

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