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अदम की शायरी में कोई लाग लपेट नहीं है, आक्रामकता है, तड़प है और उसी तड़प से सना हुआ व्यंग्य है

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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                                                  दुष्यंत कुमार ने अपनी ग़ज़लों से शायरी की जिस नयी राजनीति की शुरुआत की थी, अदम ने उसे उस मुकाम तक पहुँचाने की कोशिश की है, जहाँ से एक एक चीज़ बगैर किसी धुंधलके के पहचानी जा सके-

जो उलझ कर रह गयी है फाइलों के जाल में
गाँव तक वह रौशनी आएगी कितने साल में

बूढ़ा बरगद साक्षी है किस तरह से खो गयी
राम सुधि की झौपड़ी सरपंच की चौपाल में




अदम की निपट गंवई अंदाज़़ में, महानगरीय चकाचौंध और चमकीली कविताई को हैरान कर देने वाली अदा सबसे जुदा और विलक्षण है-

किसको उम्मीद थी जब रौशनी जवां होगी
कल के बदनाम अंधेरों पे मेहरबां होगी

खिले हैं फूल कटी छातियों की धरती पर
फिर मेरे गीत में मासूमियत कहाँ होगी

आप आयें तो कभी गाँव की चौपालों में
मैं रहूँ या न रहूँ भूख मेज़बां होगी


अदम अपनी शायरी में ठेठ गंवई दो टूकपन और बेतकल्लुफी से काम लेते हैं। उनके कथन में कोई लाग लपेट नहीं है, आक्रामकता है, तड़प है  और उसी तड़प से सना हुआ व्यंग्य है-

ग़ज़ल को ले चलो अब गाँव के दिलकश नजारों में
मुसलसल फन का दम घुटता है इन अदबी इदारों में

अदीबों ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ
मुलम्मे के सिवा क्या है फ़लक के चाँद तारों में

 
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अदम साहब की शायरी में अवाम बसता है उसके सुख दुःख बसते हैं शोषित और शोषण करने वाले बसते हैं-

बेचता यूँ ही नहीं है आदमी ईमान को
भूख ले जाती है ऐसे मोड़ पर इंसान को

सब्र की इक हद भी होती है तवज्जो दीजिए
गर्म रक्खें कब तलक नारों से दस्तरखान को

शबनमी होंठों की गर्मी दे न पाएगी सुकून
पेट के भूगोल में उलझे हुए इंसान को


वे मुशायरों में अपने देशी अंदाज़ में ही शिरकत करते थे, घुटनों तक मटमैली धोती, सिकुड़ा कुरता और गले में सफेद गमछा डाले एक ठेठ देहाती इंसान। देखकर आप कुछ भी अंदाज़ा नहीं लगा सकते लेकिन अचानक माइक पे आ जाएं और फिर अपनी धारदार रचनाएं पढ़े तो आप सुनते ही रह जाएं

देखना सुनना व् सच कहना जिन्हें भाता नहीं
कुर्सियों पर फिर वही बापू के बन्दर आ गए

कल तलक जो हाशिए पर भी न आते थे नज़र
आजकल बाजार में उनके कलेंडर आ गए

अदम जी की शायरी में आज जनता की गुर्राहट और आक्रामक मुद्रा का सौंदर्य मिसरे-मिसरे में मौजूद है, उनके  व्यंग्य में ऐसी धार है के पाठक का कलेजा चीर कर रख दे, आप उनकी ग़ज़लों को कहीं से भी पढ़ना शुरू कर दीजिए, कुछ अलग ही महसूस करेंगे

वल्लाह किस जुनूँ के सताए हुए हैं लोग
हमसाए के लहू में नहाए हुए हैं लोग

ये तिश्नगी गवाह है घायल है इनकी रूह
चेहरे ही तबस्सुम से सजाए हुए हैं लोग

ग़ैरत मरी तो वाक़ई इंसान मर गया
जीने की सिर्फ़ रस्म निभाए हुए हैं लोग

कहने को कह रहे हैं मुबारक हो नया साल
खंज़र भी आस्तीं में छुपाए हुए हैं लोग
एक वर्ष पहले
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