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अब्दुल हमीद 'अदम' की ग़ज़ल: बहारें तेरी आशियाने तेरे

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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                            बातें तेरी वो वो फ़साने तेरे
        
                                                    
                            
शगुफ़्ता शगुफ़्ता बहाने तेरे

बस एक ज़ख़्म नज़्ज़ारा हिस्सा मेरा
बहारें तेरी आशियाने तेरे

बस एक दाग़-ए-सज्दा मेरी क़ायनात
जबीनें तेरी आस्ताने तेरे

ज़मीर-ए-सदफ़ में किरन का मुक़ाम
अनोखे अनोखे ठिकाने तेरे

फ़क़ीरों का जमघट घड़ी दो घड़ी
शराबें तेरी बादाख़ाने तेरे

बहार-ओ-ख़िज़ाँ कम निगाहों के वहम
बुरे या भले सब ज़माने तेरे

'अदम' भी है तेरा हिकायतकदाह
कहाँ तक गये हैं फ़साने तेरे

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5 घंटे पहले
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