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आज का शब्द: अक्षर और उमाकांत मालवीय की कविता- नाकाफ़ी लगती है हर ज़बान

काव्य डेस्क

Aaj Ka Shabd
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                                                  'हिंदी हैं हम' शब्द श्रृंखला में आज का शब्द है- अक्षर, जिसका अर्थ है- अच्युत, स्थिर, वर्णमाला का कोई स्वर या व्यंजन वर्ण। प्रस्तुत है उमाकंत मालवीय की कविता- नाकाफ़ी लगती है हर ज़बान 

नाकाफ़ी लगती है हर ज़बान 
कोई अक्षर 
कोई शब्द किसी भाषा का 
पूरा-पूरा कैसे व्यक्त करे 
क्या कुछ कहता मन का बियाबान? 

एक रहा आने की, जाने की 
घिसे-पिटे पंगु कुछ मुहावरे 
दीमक की चाटी कुछ शक्लें हैं 
बदहवास कुछ, कुछ-कुछ बावरे। 
कोई कितना ज़हर पिए कहो 
नीला पड़ गया टँगा आसमान। 

बाबा आदम से गुम हुए सभी 
तोड़ते ज़मीन कुछ तलाशते। 
रूढ़ हो गईं सारी मुद्राएँ 
अर्थ जरा-जर्जर-से खाँसते। 
कितना यांत्रिक! आदत-सा लगता 
डूब रहा सूरज या हो विहान। 
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चाहे जितना कह दो फिर भी तो 
रह जाता है कितना अनकहा। 
कितनी औपचारिक हैं सिसकियाँ 
कितना रस्मी लगता कहकहा। 
अगुआता घर-घर भुतहा भविष्य 
और अप्रस्तुत लगता वर्तमान। 
3 वर्ष पहले
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