एक किताब जिसका नाम लिया था किसी ने, उस दिन सोचा कि ख़रीद लूंगी। ऑनलाइन देखा भी लेकिन न जाने क्या सोच कर नहीं ख़रीदी। बीते दिन पुस्तक मेले में वही किताब दिखी जैसे अपने होने का एहसास इस तरह करवा रही हो कि पैंडिंग प्लान को पूरा करने का समय है। अब टालो मत और ख़रीद लो और मैंने ले ली। पूरे मेले को घूमने के बाद ऐसी कितनी किताबें दिखीं और.... सोचा कि क्या करूं।
दिल्ली के प्रगति मैदान में इन दिनों विश्व पुस्तक मेला लगा है, लगभग छ: हॉल के भीतर हर क्षेत्र की हर उम्र के लोगों के लिए किताबें हैं। रविवार शाम के बाद सोमवार को भी वहां पहुंची थी। ज़ाहिर है कि रविवार की अपेक्षा सोमवार को तो भीड़ कम ही होनी थी - मेरे जैसे ही कुछ लोग हैं कि जिनकी छुट्टी सोमवार को होती है। पूरे दिन हर एक स्टॉल पर किताबें तसल्ली से देखने का समय था। इसी हॉल में सबसे कॉर्नर पर कुछ सेल्फ़-हेल्प किताबें थीं 200 की कोई भी किताब मिलेगी, सब अंग्रेज़ी में थीं। सेल्फ़-हेल्प यानी ऐसी किताबें जिससे मानसिक स्थिति और व्यक्तिगत सुधार होते हैं, ऐसी किताबों की अमूमन बहुत बिक्री होती है। ये वो किताबें हैं जो सड़क किनारे बैठने वाले किताब वाले दुकानदार भी अपने पास सबसे ज़्यादा रखते हैं।
वहीं आगे हार्पर कॉलिंस है, अंग्रेज़ी किताबों के स्टॉल पर हिंदी की तुलना में अधिक भीड़ होती है। वहां कुछ लोग रील बना रहे थे, रील का अंदाज़ा इसलिए लगा रही हूं कि वो एक ट्रेंडिंग काम है इन दिनों। मेरा भी रील बनाने का मन है लेकिन दिमाग़ किताब में उलझ कर एक लेखक से टकरा गया। मैंने उन्हें कुछ एक पॉडकास्ट में देखा है, लोग घेर कर खड़े हैं। मुझे भी एक सवाल पूछना था लेकिन कभी और सोचकर निकल गई। अब हम पेंग्विन में हैं, यहां भी भीड़ है- रविवार की तुलना में कम है लेकिन है। दो लड़कियां एक किताब खोलकर चर्चा कर रही हैं कि ख़रीदें या किंडल एडिशन लें।
मुझे अपने ओल्ड स्कूल होने की बात याद आई कि किंडल से पढ़ना कितना मुश्किल भरा भी होता है। किताबें तो किताब से ही पढ़नी चाहिए। वे लड़कियां भी अब किताब ख़रीद रही हैं। अलग-अलग सेक्शन पर कई किताबें हैं। कई किताबें उठाकर देखीं मैंने। सुंदर जिल्द और कवर हैं। कितनी मेहनत है ये तैयार करने में। पांडुलिपि लिखने के बाद भी कई काम हैं जो करने के यत्न हैं और एक किताब तैयार होकर किसी पाठक के हाथ में पहुंचती है। मैंने भी एक-दो किताबें लीं जिन लेखकों के नाम जाने-पहचाने थे उनकी वे किताबें, जो मेरे पास होनी चाहिए। बहुत देर अंग्रेज़ी के सेक्शन में घूम कर फिर हॉल नंबर 2 में हूं।
हॉल नंबर 2 हिंदी प्रेमियों के लिए है। पहुंचते ही लगा कि किसी दूर शहर से घूमकर अपने घर वापस आ गई हूं। राजकमल, राजपाल, हिन्द युग्म, प्रभात, गीता-प्रेस औऱ भी कितने ही प्रकाशन हैं जो अपने साथ कई लेखकों के सपनों को लेकर वहां अपनी मौजूदगी बनाए हुए हैं। एक स्टॉल पर ओशो की किताबें मिलीं पचास प्रतिशत छूट के साथ तो बिना सोचे ले लीं। कुछ प्रतिनिधि कहानियां लीं औऱ मुशायरे की आवाज़ कान में सुनाई देने लगी। पीछे सजी स्टेज पर भी साहत्यिक चर्चाएं हैं। हर स्टॉल के बाहर लेखक और उनके प्रशंसक हैं। लगभग 5 घंटे इस ह़ॉल में बीते। बतकही करते, लोगों से मिलते, उन लोगों को देखते जो अपने बच्चों को मोबाइल से हटाकर किताबों की दुनिया में लाना चाहते हैं, वे युगल जो लिटरेचर को पसंद करते हैं और निर्मल की डायरी खोज रहे हैं। एक बेहद बुज़ुर्ग व्यक्ति भी जिनकी उम्र लगभग अस्सी तो होगी ही अपनी पोती के साथ किताब हाथ में लिए चल रहे हैं।
मैं अब एक स्टॉल के भीतर कुछ किताबों के पन्ने पलट रही हूं। हाथ में लगभग 9 किताबें हैं जो ख़रीदी हैं। मुझे सिनेमा और मीडिया पर भी कुछ लेना है। किताबें झांक रही हैं और मैं याद कर रही हूं कि पिछले साल जो किताबें ख़रीदी थीं, पढ़ी जानी बाक़ी हैं। ये किताबें गुलज़ार साहब की नज़्म से बस थोड़ी ही अलग हैं। य़हां अलमारी के शीशे बंद नहीं खुले हैं।
2 वर्ष पहले