मन के मते न चलिये, मन के मते अनेक
जो मन पर असवार है, सो साधु कोई एक ।।
भावार्थ:- मन के मत में न चलो, क्योंकि मन के अनेको मत हैं। जो मन को सदैव अपने अधीन रखता है, वह साधु कोई विरला ही होता है।
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एक शब्द सुख खानि है, एक शब्द दुःखराखि है
एक शब्द बन्धन कटे, एक शब्द गल फंसि ।।
भावार्थ:- समता के शब्द सुख की खान हैं, और विषमता के शब्द दुखों की ढेरी हैं। निर्णय के शब्दों से विषय - बन्धन कटते हैं, और मोह - माया के शब्द गले की फांस हो जाते हैं।
कबीर यह संसार है, जैसा सेमल फूल
दिन दस के व्यवहार में, झूठे रंग न भूले ।।
भावार्थ:- कबीर कहते हैं कि यह संसार सेमल के फूल के भांति केवल दिखावा है। अतः झूठे रंगों को जीवन के दस दिनों के व्यवहार एवं चहल - पहल में मत भूलो।
भेष देख मत भूलिये, बुझि लीजिये ज्ञान
बिना कसौटी होत नहिं, कंचन की पहिचान ।।
भावार्थ:- केवल उत्तम साधु वेष देखकर मत भूल जाओ, उनसे ज्ञान की बातें पूछो! क्योंकि बिना कसौटी के सोने की पहचान नहीं होती।
कामी अमी न भावई, विष ही कौं लै सोधि
कुबुद्धि न जाई जीव की, भावै स्यंभ रहौ प्रमोधि ।।
भावार्थ:- कामी मनुष्य को अमृत पसंद नहीं आता, वह तो जगह-जगह विष को ही खोजता रहता है। कामी जीव की कुबुद्धि जाती नहीं, चाहे स्वयं शम्भु ही उपदेश दे-देकर उसे समझावें।
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