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कबीर के 5 चुनिंदा दोहे जिनमें छुपा जीवन का मर्म

काव्य डेस्क

Sahitya
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                                                  मन के मते न चलिये, मन के मते अनेक 
जो मन पर असवार है, सो साधु कोई एक ।।

भावार्थ:-
मन के मत में न चलो, क्योंकि मन के अनेको मत हैं। जो मन को सदैव अपने अधीन रखता है, वह साधु कोई विरला ही होता है। 
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एक शब्द सुख खानि है, एक शब्द दुःखराखि है 
एक शब्द बन्धन कटे, एक शब्द गल फंसि ।।

भावार्थ:-
समता के शब्द सुख की खान हैं, और विषमता के शब्द दुखों की ढेरी हैं। निर्णय के शब्दों से विषय - बन्धन कटते हैं, और मोह - माया के शब्द गले की फांस हो जाते हैं।

कबीर यह संसार है, जैसा सेमल फूल 
दिन दस के व्यवहार में, झूठे रंग न भूले ।।

भावार्थ:-
  कबीर कहते हैं कि यह संसार सेमल के फूल के भांति केवल दिखावा है। अतः झूठे रंगों को जीवन के दस दिनों के व्यवहार एवं चहल - पहल में मत भूलो। 
 

भेष देख मत भूलिये, बुझि लीजिये ज्ञान 
बिना कसौटी होत नहिं, कंचन की पहिचान ।।

 भावार्थ:-
 केवल उत्तम साधु वेष देखकर मत भूल जाओ, उनसे ज्ञान की बातें पूछो! क्योंकि बिना कसौटी के सोने की पहचान नहीं होती।

कामी अमी न भावई, विष ही कौं लै सोधि
कुबुद्धि न जाई जीव की, भावै स्यंभ रहौ प्रमोधि ।।

भावार्थ:-
 कामी मनुष्य को अमृत पसंद नहीं आता, वह तो जगह-जगह विष को ही खोजता रहता है। कामी जीव की कुबुद्धि जाती नहीं, चाहे स्वयं शम्भु ही उपदेश दे-देकर उसे समझावें।

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6 घंटे पहले
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