श्रीकांत वर्मा हिंदी की नई कविता धारा के एक बड़े नाम थे। यह और बात है कि हिंदी भाषी समाज में अपने अन्य समकालीनों के उलट उन्हें बहुत देर से जाना गया। उससे भी दुखद यह कि कम जाना गया। श्रीकांत वर्मा मुक्तिबोध की पीढ़ी के बाद के कवियों में अन्यतम बेचैन कवि इस माने में ज्यादा हैं कि उन्होंने अपनी कविता के जरिए न केवल अपने समय का सीधा और अन्दर तक तिलमिला देने वाला भयावह साक्षात्कार किया बल्कि हर अमानवीय ताकत के विरुद्ध एक निर्मम और नंगी भिड़ंत की । छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में जन्मे श्रीकांत वर्मा सक्रिय राजनीतिज्ञ भी थे। जीवन के आरंभिक दौर में लोहिया से प्रभावित थे, बाद में देश के एक बड़े राजनीतिक दल से जुड़े, राज्यसभा में रहे। हिंदी के ही नहीं, तीसरी दुनिया के देशों में रचे जा रहे साहित्य के गहरे जानकार और अनुवादक थे। उनकी कविता में नाराज़गी, असहमति और विरोध का स्वर सबसे मुखर है । उनकी कविता उस दर्पण की तरह है, जहाँ कोई झूठ छिप नहीं सकता ।
प्रस्तुत हैं उनकी 3 चुनिंदा कविताएं-
1-
केवल अशोक लौट रहा है
और सब
कलिंग का पता पूछ रहे हैं
केवल अशोक सिर झुकाये हुए है
और सब
विजेता की तह चल रहे हैं
केवल अशोक के कानों में चीख
गूंज रही है
और सब हंसते-हंसते दोहरे हो रहे हैं
केवल अशोक ने शस्त्र रख दिए हैं
केवल अशोक लड़ रहा था।
2-
कैंसर से मरती हैं हस्तियां
हैजे से बस्तियां
वकील रक्तचाप से
कोई नहीं मरता
अपने पाप से
3-
चाहता तो बच सकता था
मगर कैसे बच सकता था
जो बचेगा
कैसे रचेगा
पहले मैं झुलसा
फिर धधका
चिटखने लगा
कराह सकता था
मगर कैसे कराह सकता था
जो कराहेगा
कैसे निबाहेगा
न यह शहादत थी
न यह उत्सर्ग था
न यह आत्मपीड़न था
न यह सज़ा थी
तब
क्या था यह
किसी के मत्थे मढ़ सकता था
मगर कैसे मढ़ सकता था
जो मढ़ेगा कैसे गढ़ेगा।
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11 महीने पहले