साहित्यकारों की बड़ी दुनिया है लेकिन इस बड़ी दुनिया के बावजूद साहित्यकार अकेला होता है । उसके साथ भीड़ नहीं चलती। भीड़ तो नेताओं के साथ चलती है व्यापारियों के साथ चलती है। रामदरश मिश्र न तो नेता थे ना व्यापारी थे। वे साहित्य के साधक थे , सरस्वती के उपासक थे। वे जब थे तो भी उनकी बैठक में साहित्यकारों की महफिल आनन फानन में जम जाती थी। अभी हाल तक जब बीमार होकर मजबूरन चारपाई पर पड़े थे लेकिन स्मृति और मेधा के धनी थे तो जैसे ही दो-तीन लेखक मिलने आते वे गोष्ठी सी जमा लेते थे।
सुनना सुनाना शुरू कर देते थे। ऐसा व्यक्ति जो लगभग सब का प्रिय हो जो सबका प्रशंसक हो सबके कांधे पर हाथ धरता हो , सबको आगे बढ़ाता हो,निर्व्याज स्नेह करता हो ऐसे राम दरश जी ने जब आज महा प्रयाण किया तो उनके दाह संस्कार में साहित्यकारों प्रेमियों नाते रिश्तेदारों की अपार भीड़ जुटती गई। देश विदेश में जैसे खबर फैली, अखबारों, वेब चैनलों और सोशल मीडिया पर उनके प्रति श्रद्धांजलि का ज्वार उमड़ पड़ा। सबकी आंखों में एक नमी थी जिसे देखकर एक कवि की कविता याद आ रही थी : विदा समय क्यों भरे नयन हैं!
श्मशान गृह में सैकड़ों की भीड़
ब्रह्मा अपार्टमेंट्स, द्वारका के लिए भी यह एक इतिहास की तरह है कि वहां पर कभी 102 साल का व्यक्ति रहता था जिसकी अर्थी के पीछे-पीछे सैकड़ो की भीड़ चल रही थी और जब मंगलापुरी श्मशान गृह में उनकी काया को चिता पर सजाया गया तो लगभग 200 लोगों का समवाय नम आंखों के साथ उन्हें श्रद्धांजलि दे रहा था। इस अंतिम वेला में उन्हें आखिरी विदाई देने पधारे थे रामदरश जी के अनन्य मित्र प्रोफेसर नित्यानंद तिवारी, भगवान दास मोरवाल, डॉ प्रकाश मनु, डॉ सुनीता, प्रताप सहगल, डॉक्टर पवन माथुर, लक्ष्मी शंकर बाजपेई, अनिल जोशी, डॉ राजेंद्र गौतम, साहित्य अकादमी के उप सचिव डॉक्टर देवेंद्र कुमार देवेश, प्रकाशक आमोद माहेश्वरी, केशव मोहन पांडे और अशोक शर्मा, डॉक्टर जसवीर त्यागी, हरि शंकर राढी, उपेंद्र मिश्रा, डॉ वेदमित्र शुक्ल, डॉक्टर सोनी पांडे, डॉक्टर रेनू यादव, डॉक्टर अमरेंद्र पांडे, कैलाश प्रकाश सिंह, अनिल मीत, ताराचंद नादान और नरेश शांडिल्य ।
अन्य बहुत सारे लोग जिनके नाम ठीक से याद नहीं आ रहे लेकिन वह सब बहुत समर्पित निष्ठा के साथ वहां पर आए थे उनके गुणों की चर्चा कर रहे थे। यह वह लोग थे जो कहे बगाहे राम दरश जी से अक्सर मिलते रहते थे। राम दरश जी के पास कोई प्रोटोकॉल नहीं था शाम का समय लगभग मित्रों के लिए ही नियत था। वे अपने को सौभाग्यशाली मानते थे कि वह जीवन में कभी अकेले नहीं पड़े। उत्तर जीवन में जब सारे इष्ट मित्र धीरे-धीरे साथ छोड़ देते हैं, उनके साथ मित्रों का एक समूह है जो उनका ध्यान रखता है, उनसे मिलने आता है उन्हें सुनता है और अपनी सुनाता भी है।
हिंदी की दुनिया का बड़ा नागरिक
हिंदी की दुनिया का सबसे बड़ा नागरिक अब नहीं है लेकिन उसकी बातें लोगों के पास हैं, उसकी कितनी छवियां लोगों के पास हैं, कितने लोगों से हुई बतकहियों के रिकार्ड उनके पास हैं। वह बहुत कुछ ऐसा छोड़ गए हैं जिससे हम सतत उनकी उपस्थिति को देख सकते हैं, महसूस कर सकते हैं।
रामदरश जी के जीवन में ऐसा नहीं कि दुख नहीं थे लेकिन उन्होंने दुखों को मुंह नहीं लगाया। हेमंत मिश्र जैसे मंजे हुए अभिनेता पुत्र को असमय खोना उनके जीवन की एक बड़ी त्रासदी है पर इसी रचनात्मकता के भरोसे वे इस दुख से पार पा सके। उन्हें एक उपन्यास में पिता के रूप में याद किया। सरस्वती जी उनकी पत्नी ही नहीं उनकी बौद्धिक सहचर थीं तो बेटी स्मिता को उनके रचनात्मक संसार को सहेजने में सुख मिलता था। वह अध्यापन व्यस्त होने के बावजूद रोज कुछ न कुछ समय अपने पिता के लिए निकालती थी। उनके पास बैठती थी उनकी कविताएं रिकॉर्ड करती थी। उनकी मुद्राएं दर्ज करती थी।
उन्हें महसूस करती थी और कभी-कभी उन्हें बीमार देखकर आंखें गीली भी कर लिया करती थी। राम दरश जी उसके पिता ही नहीं अब उसके लिए एक मिशन बन चुके थे । उन पर फिल्म बननी है, डुमरी गांव जाना है वाराणसी में कुछ दृश्य शूट करने हैं, लोगों के संस्मरण रिकॉर्ड करने हैं, उनकी कविताएं रिकॉर्ड करनी हैं, वेबसाइट पर क्या कुछ अपलोड होना है, उनकी लाइब्रेरी को आगामी पीडिया के लिए सुरक्षित रखना है, युवा पीढ़ी को साहित्य सृजन के लिए पुरस्कृत करना है इन सब प्रक्रियाओं में ही स्मिता का समय बीतता था। सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता... अब यह चिड़िया कहां रहेगी? सहसा याद हो आई है। मुझे स्मिता का ध्यान आता है और मन पूछता है: अब यह बिटिया कहां रहेगी? शायद उनकी स्मृतियों में।
वही एक महफूज जगह होगी जहां बेटी अपने पिता को महसूस कर सकती है। शशांक जी ने एक बेटे का धर्म निभाया तो बहू ने भी एक आदर्श बहु का। जिस फ्लैट से आए दिन कविताओं की अनुगूंज उठती थी अब धीरे-धीरे वह मौन रहना सीखने लगेगा। यह होता है एक कवि का प्रभा मंडल । वह जहां रहता है अपनी प्रभा से अपनी दीप्ति से पूरे वातावरण को आलोकित किये रहता है।
बड़ा लेखक ऐसे ही हर बार कुछ कुछ छूट जाया करता है
उन्हें अनेक मंचों पर पिछले चार दशकों से देखा सुना है, उनके साथ समय बिताया है, वाणी विहार उत्तम नगर में रहते हुए उनकी अनेक संगत की है। उन पर लिखा है। जी भर कर लिखा है और पाया है कि हर बार राम दरश जी पकड़ से कुछ छूट छूट जाते हैं। बड़ा लेखक ऐसे ही हर बार कुछ कुछ छूट जाया करता है और हर बार देखने पर पुनर्नवा दिखता है। रामदरश जी की कहानियों और उपन्यासों के सैकड़ो किरदार हैं जिनके सुख-दुख को उन्होंने जिया है, जिनके सरोकारों से राम दरश जी का वास्ता रहा है। उन्होंने किसी विचारधारा का राजमार्ग स्वीकार न कर अपने लिए विचारों की एक पगडंडी बनाई और इस पर एक सदी तक चलते रहे । कल तक हम उनके सानिध्य में थे। आज हम उस सानिध्य से विरत हैं। बस एक अनुगूंज है, एक महक है हवा में बिखरी हुई.... हवा में हस्ताक्षर की तरह। हम रामदरश जी के हस्ताक्षर को इसी तरह अपनी धड़कनों में दर्ज होता हुआ महसूस करते रहेंगे।
उनका एक गीत है आषाढ़ के दिनों का...रस से भरा भाव से भरा गीत जिसमें उनका पूरा मिजाज बोलता है: मैं आषाढ़ का पहला बादल मेरी राह न बांधो! आज वे जिस राह पर निकल गए हैं, वहां से वापसी की राह नहीं है और यही वह प्रश्न है जिसका कोई उत्तर हमारे पास नहीं है।
(डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी कवि और आलोचक हैं तथा रामदरश मिश्र पर कई पुस्तकें लिखी और संपादित की हैं।)
10 महीने पहले