विज्ञापन

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का रूमानी ख़त अपनी पत्नी के नाम

काव्य डेस्क

Sahitya
विज्ञापन
                                    
                     
                                                  

"आज तुम्हारा ख़त मिला, बड़ी राहत हुई। आज हमारी शादी की सालगिरह है। दुआ है कि तुम्हें (बल्कि हमें) ये दिन कई बार देखना नसीब हों। इन दस बरस में बहुत सा सुख देखा है और थोड़ा सा दुख भी लेकिन हमने ये तमाम दिन दयानतदारी, सुकूने-ख़ातिर से गुज़ारे हैं और ज़िन्दगी में सबसे अहम बात यही है। तो आओ उन बीते हुए दिनों का शुक्राना अदा करें। ये दस बरस ऐसी दौलत हैं जिसे कभी फ़ना नहीं और जिसे कोई छीन नहीं सकता। अगर किसी को उक़बा (परलोक) या आसमानी एहकामात (ईश्वरीय आदेश) पर ईमान न हो तो नेकी और अख़लाक़ (सदाचरण) के हक़ में सबसे बड़ी दलील यही है कि जो लम्हा हक़-ओ-सदाक़त की परवरिश में गुज़रे वह बजाय खुद-ख़ुशी का ऐसा ख़जाना बन जाता है जिसे कोई रहजन लूट नहीं सकता, न कोई जाबिर (आततायी) ज़ब्त कर सकता है।

विज्ञापन

तुमने अपने घर की तन्हाई का ज़िक्र किया हैं, मैं जानता हूँ कि यह तन्हाई कितनी कड़ी और जुदाई के ये लम्हे कितने भारी हैं। इनको दिल से धोया तो नहीं जा सकता, लेकिन इनका बोझ इस तसव्वुर से कम ज़रूर किया जा सकता है कि बीते हुए दिन कैसे अच्छे थे और आने वाले दिन कितने बेहतर होंगे। मैं तो यही करता हूँ, जब से जेलखाने का दरवाज़ा बंद हुआ हैं मैं कभी माज़ी के पैरहन को तार-तार करके उसे मुख़्तलिफ़ (विभिन) सूरतों में दुबारा बुनता रहता हूँ और कभी आने वाले दिनों को दामे-तसव्वुर में मुक़ैय्यद (कल्पना के जाल में क़ैद) करके उनसे अपनी मर्ज़ी और पसन्द के मुख़्तलिफ़ मुरक़्के़ (अलबम) तरतीब देता रहता हूँ।जानता हूँ कि यह बेकार सा शग्ल है, इसलिए कि ख़्वाबों को हक़ीक़त की ज़ंजीरों से आज़ाद नहीं किया जा सकता। लेकिन इतना ज़रूर है कि थोड़ी देर के लिए आदमी तख़य्युल (कल्पना-शक्ति) के बल पर गिर्दो- पेश (चारों ओर) की दलदल से पाँव छुड़ा सकता है।

यहाँ गर्मी का मौसम गै़रमामूली तौर से तवील होता जा रहा है। रातें ख़ुनक हो चुकी हैं लेकिन दिन अब भी गर्म हैं, अगर्चे बहुत नाख़ुशगवार नहीं। मालूम होता है कि दुनिया के इस हिस्से में गुलाबी जाड़ों की वह सहर-आफ़री रुत वारिद ही नहीं होती जिससे हम पंजाब में आश्ना हैं। वह मौसम, जब हवा का हर झोंका किसी के प्यार का लम्स (स्पर्श) महसूस होता है और गुदाज़ आसमानों में किसी दोशीज़ा (कुमारी) जिस्म की-सी नर्मी और आँच महसूस होती है। ख़ैर, ऐसे मौसम से आसूदगिए-नफ़्स (आत्निक संतोष) का कुछ बदल मुझे उस ख़ुशबू से हाथ आ जाता है जो तुमने भेजी थी और जिसे मैं हर रात अपने तकिये पर छिड़क देता हूँ। 

साभार: फ़ैज़ की सदी 
सम्पादक - रवीन्द्र कालिया
ज्ञानपीठ प्रकाशन 
4 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Ankit Kumar

10067 कविताएं

View Profile