फ़िल्म 'आपकी कसम' के लिए यह दिल छू लेने वाला गीत लिखा था जाने माने गीतकार आनंद बक्शी साहब ने। आज इस गीत को गुनगुनाते हुए दिल में बार-बार यही ख़्याल आता है कि काश! गुजरे हुए मक़ाम फिर आते.. तो फ़िर हमारे सामने बख्शी साहब किसी नए गीत की कोई पंक्ति गुनगुनाते.. हम झूम जाते.. मुस्कुराते.. और उनसे कहते.. हैप्पी बर्थडे बख्शी साहब!!
जी हाँ, दोस्तों! आज 21 जुलाई है। वर्ष 1930 में आज ही के दिन पंजाब प्रांत के रावलपिंडी (अब पाकिस्तान) में आनंद बख़्शी साहब का जन्म हुआ था। वर्ष 1947 में भारत विभाजन के वक्त आपका परिवार लखनऊ में आकर बस गया।
आप शुरू में नौसेना में रहे लेकिन आपके जीवन का उद्देश्य कुछ और ही था। लिहाजा आपने भीतर के कलाकार को आकार देने के लिए बंदूक छोड़कर कलम थाम ली और बंबई जा पहुंचे। वहाँ शुरुआत में आपको बहुत संघर्ष करना पड़ा लेकिन जब काम मिला, पहचान मिली और सफलता मिलने लगी तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा।
इस दौरान आपके लिखे गीतों को स्क्रीन पर गाकर कई नए अभिनेता स्टार और सुपरस्टार बन गए। वर्ष 1967 में फिल्म फर्ज के 'मस्त बहारों का मैं आशिक, मैं जो चाहे यार करूं, और 'हम तो तेरे आशिक हैं सदियों पुराने' सरीखे रोमांटिक गीतों ने जितेंद्र को बड़ा स्टार बनाया। वहीं वर्ष 1969 में आराधना फिल्म ने राजेश खन्ना को सुपरस्टार बना दिया। इस फिल्म का 'मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू' गीत ऐसा हिट हुआ कि लोकप्रियता का वह सिलसिला आज भी बरकरार है।
गौरतलब है कि वर्ष 1957-58 में भगवान दादा की फिल्म 'भला आदमी' के लिए गीत लेखन की शुरुआत से लेकर वर्ष 2002 में अंतिम सांस लेने तक आपने 600 से अधिक फिल्मों के लिए 3500 से अधिक गाने लिखे। आपको सर्वश्रेष्ठ गीतकार के रूप में चार बार फिल्म फेयर जैसा प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला।
अगर मैं जाने-माने गीतकार जावेद अख्तर साहब के शब्दों में अपनी बात कहूँ तो आनंद बख्शी साहब वह गीतकार हैं जिन्होंने फिल्मों में इस्तेमाल होने वाली पोएट्री को रोजमर्रा की जबान बनाया। उसे लोक का रंग दिया। ऐसा लगने लगा कि हम जो बोलते हैं, वही गा रहे हैं।
कुछ उदाहरण बानगी बतौर प्रस्तुत हैं:-
अच्छा तो हम चलते हैं
फिर कब मिलोगे
जब तुम कहोगे
तू कितनी अच्छी है, तू कितनी भोली है,
प्यारी प्यारी है.. ओ माँ! ओ माँ!
कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना
छोड़ो, बेकार की बातों में कहीं बीत न जाए रैना
सावन का महीना पवन करे शोर
जियरारा झूमे ऐसे जैसे मन में नाचे मोर
राम करे ऐसा हो जाए
मेरी निंदिया तोहे मिल जाए
मैं जागूँ तू सो जाए
आनंद बख्शी ने उस दौर की फिल्मों को एक से बढ़कर एक प्रेम गीत दिए। सादा शब्दों में बेहद सादगी और पाकीज़गी के साथ प्यार के गहरे गहरे एहसास.. आज भी इन क़माल के गीतों का जादू हम सबके सर चढ़कर बोलता है..
कोरा कागज था ये मन मेरा
लिख दिया नाम जिसपे तेरा
रूप तेरा मस्ताना, प्यार मेरा दीवाना,
भूल कोई हमसे ना हो जाए
तेरे मेरे बीच में कैसा है ये बंधन अनजाना
तूने नहीं जाना, मैंने नहीं जाना
जब हम जवाँ होंगे, जाने कहाँ होंगे
लेकिन जहाँ होंगे वहाँ फरियाद करेंगे
तुझे याद करेंगे
ख़त लिख दे सँवरिया के नाम बाबू
कोरे कागज पे लिख दे सलाम बाबू
वो जान जाएंगे, पहचान जाएंगे
दर्दे दिल.. दर्दे जिगर..
दिल में जगाया आपने
चाँद सी महबूबा हो मेरी कब ऐसा मैंने सोचा था
हाँ तुम बिलकुल वैसी हो जैसा मैंने सोचा था
अपने पड़ोसियों, दोस्तों और नाते- रिश्तेदारों के सुख से दुखी लोगों के साथ-साथ अपने राई जैसे दुख को पहाड़ जैसा समझने वाले लोगों को बख्शी साहब का यह गीत बार-बार गुनगुनाना चाहिए :-
दुनिया में कितना ग़म है
मेरा ग़म कितना कम है
औरों का ग़म देखा तो
मैं अपना ग़म भूल गया
अगर आप खोया हुआ आत्मविश्वास पुनः पाना चाहते हैं या अपनी प्रार्थना में बल जगाना चाहते हैं तो आप बख्शी साहब की अनमोल कलम से निकला आराधना फ़िल्म का यह गीत अवश्य सुनिएगा:-
काहे को रोए! चाहे जो होए!
सफल होगी तेरी आराधना..
दिया टूटे तो है माटी
जले तो ये ज्योती बने
बहे आँसू तो है पानी
रुके तो ये मोती बने
ओ! ये मोती आँखों की पूँजी है
लेना बोये, काहे को रोए!
बख्शी साहब ने ज़िंदगी के फलसफे को ख़ुद भी खूब समझा और पूरी दुनिया को भी बखूबी समझा गए:-
ये जीवन है, इस जीवन का यही है, यही है, यही है रंग-रूप
थोड़े ग़म हैं, थोड़ी खुशियाँ, यही है छाँव-धूप
और ये भी:-
ज़िंदगी हर क़दम एक नई जंग है
जीत जाएंगे हम तू अगर संग है
आनंद बख्शी साहब के सुपुत्र राकेश आनंद बख्शी ने अपने पिता के जीवन और गीतों पर आधारित एक पुस्तक अंग्रेजी में लिखी थी जिसका अनुवाद यूनुस खान ने "नग्मे क़िस्से बातें यादें" शीर्षक से हिंदी में किया है।
बख्शी साहब ने 'चिट्ठी आई है' गीत के एक अंतरे में लिखा था- "पहले जब तू ख़त लिखता था। कागज में चेहरा दिखता था.." मुझे यकीन है कि इस किताब में आपको बख्शी साहब का मुकम्मल चेहरा देखने को अवश्य मिल जाएगा।
इतनी बड़ी शख़्सियत पर कितना भी लिखो, तब भी कम ही लिख पाता है। बहुत कुछ छूट जाता है। उसके बारे में आख़िर लिखा भी क्या जाए जिसने यह लिखा हो कि "शीशा हो या दिल हो, आखिर टूट जाता है.."
2 वर्ष पहले