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पाकिस्तान यात्रा के बाद मुन्नवर कुछ यूं उधड़ने लगते हैं तुरपाई की तरह

काव्य डेस्क

Mud Mud Ke Dekhta Hu
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                            मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं,
        
                                                    
                            
तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं।
तुमने घर छोड़ा चलो तुम तो मुहाजिर हो गये, 
हम यहां हाजिर रहे और गैर हाजिर हो गये।

बचपन खुशबू की तरह होता है, बहुत देर नहीं ठहरता या बचपन को पर लग जाते हैं। दिन महीनों में और महीने बरसों में तब्दील होते रहे। 1947 के बंटवारे का दंश झेल रहे लोगों के दिलों की  
कुछ ऐसी ही यादों को सजाया है मशहूर शायर मुन्नवर राना ने । मुन्नवर अपनी किताब मीर आ के लौट गया में लिखते हैं। 

मुहाजिर कह के दुनिया इसलिए हमको सताती है 
कि हम आते हुए कब्रों में शजरा छोड़ आये हैं।
मुहाजिर इसलिए हम हैं कि इक मिसरे की सूरत हैं
यहां आते हुए हम एक मिसरा छोड़ आये हैं। 

वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित मुनव्वर राना की आत्मकथा के खण्ड-1 में वो अपनी पाकिस्तान यात्रा के बहाने संस्मरण में लिखते हैं हम खुद उधड़ने लगते हैं तुरपाई की तरह। जिसमें वो बंटवारे के दर्द को इस तरह से बताने की कोशिश कर रहे हैं जैसे सारे वाकयात मानो कल ही की बात हों। मुन्नवर अपने संस्मरण में  अपनी पाकिस्तान 2008 की यात्रा के बहाने बंटवारे के दंश को बार बार उकेरते हैं।  अपनी यादों को शायरी में पिरोते हुए लिखते हैं 

हमें मरने से पहले सबको यह ताकीद करनी है 
किसी को मत बता देना कि क्या-क्या छोड़ आये हैं। 

बेपनाह शोर में वो मेरी आवाज कहीं खो गयी और मैं भी दूर कहीं माजी की हिजरत नसीब यादों में गुम हो गया । मुन्नवर लिखते हैं कि अजीब सी जज़्बाती कशमकश का दौर था वो रोने की इजाज़त भी सिर्फ उन्हें थी जो अंदर ही अंदर रो लेने के हुनर से बखूबी वाकिफ़ थे। हर तरफ चक्कर लगाती हुई हवस और खुदग़र्जियों ने दूसरों की दौलत और जमीने हड़पने वालों की मदद के लिए जगह-जगह अपनी  चौकियां कायम कर ली थीं।बटाई पर दी ज़मीनों की ख़ाक का बोसा लेने के लिए लठबंदों और बंन्दूकधारी कब्जेदारों से आजिज़ाना गुजारिश करनी पड़ती थी। 

उस दर्द में राना आगे लिखते हैं वो बंटवारे का दौर ऐसा था जब किसी भी शरीफ घराने को परेशान करने के लिए उसे झूठमूठ भी पाकिस्तान का हमदर्द साबित कर देना काफी था।खुल कर हंसने का मौसम तो खैर जा ही चुका था, खुल कर रोने का अखि्तयार भी हाथों से जाता रहा क्योंकि हर आंसू पर फिरका परस्ती अपनी मुहर लगाने को तैयार रहती थी। बागो बहार शख्सियतें बोनज़ाई होकर रह गई थीं। 

मुजाहिर की स्थिति क्या थी वो दर्द मुन्नवर राना के तुरपाई की तरह में बार बार झलकता है। वो लिखते हैं कि वो बेबसी का आलम था कि बचे खुचे लोग अपने-अपने इलाकों में सिर्फ कोरे काग़जों पर अंगूठा लगाने की मशीन बन कर रह गये थे। लफ्ज पाकिस्तानी कई खराब गलियों की अलामत बन कर रह गया था। आपसी रकाबतें, बेजा रंजिशें, मुआशी खींचतान और अपनी-अपनी जान बचाने की फिक्र ने हिंदुस्तानी मुसलमानों को हरिजनों से ज़्यादा मज़लूम बना कर रखा दिया। जिन पैरों का जेवर बनने के लिए चांदी की जूतियां बेताब रहती थीं, रफ्ता-रफ्ता वहीं खूबसूरत पांव हवाई चप्पलों के इश्तिहार बन कर रह गये। जिन घरों में कभी दूध के लिए बर्तन कम पड़ते थे उन घरों में मांओं की छातियां तक रेगिस्तान  के कुओं की तरह सूख गई थी। 

मुन्नवर इस चैप्टर में पाकिस्तान से घूमकर आने के बाद मुजाहिरों का  दर्द कुछ और यूं बयां करते हैं कि अब बंटवारे को आधी सदी से ज्यादा समय बीत चुका है लेकिन हम यह तय नहीं कर पाए हैं कि बीमारों को देखने और कब्र के सिरहाने खड़े होकर दुआये मगफिरत करने वालों से वीजा तलब करना  इंसानियत और रवादारी की सरासर तौहीन है। जमीन पर लकीरें खींचने और मिटाने की बागडोर उन नन्हें-नन्हें बच्चों के हाथों में होती जो सर्दियों में ऊन के गोलों की तरह कपकपाते हुए स्कूल जाते हैं, काश, तकसीम का हर फैसला सियासत के बजाय गोद में बच्चे खिलाती मांओं और दादियों के अख्तियार में होता---काश..अपनी इस मुड़ मुड़ के देखता है में वो प्रोफेसर एज़ाज अफ़ज़ल की एक शायरी को भी याद करते हैं...

हजारों सरहदों की बेड़ियां लिपटी हैं कदमों से,
हमारे पांव को भी पर बना देता तो अच्छा था।
परिंदों ने कभी रोका नहीं रस्ता परिंदो का,
खुदा दुनिया को चिड़िया घर बना देता तो अच्छा था।
 
8 वर्ष पहले
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