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धूमिल को लोहे का ‘स्वाद’ मालूम था, पाश ने लोहा ‘खाया’ था - नामवर सिंह

काव्य डेस्क

Mud Mud Ke Dekhta Hu
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स्पेन के लोककवि लोर्का की हत्या के बारे में कहा जाता है कि जब उसकी अमर कविता ‘एक बुलफाइटर की मौत पर शोकगीत’ का टेप जनरल फ़्रैंको को सुनाया गया तो जनरल ने आदेश दिया कि यह आवाज़ बंद होनी चाहिए। यह घटना लगभग 50 साल पहले की है। कविता पर- फिर वह शोकगीत ही क्यों न हो, फ़ासिस्ट प्रतिक्रिया।
पाश के रूप मे पंजाब को भी एक लोर्का मिला था।

यह कहना है प्रसिद्ध आलोचक और साहित्यकार नामवर सिंह का, राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किताब ‘बीच का रास्ता नहीं होता’ की भूमिका में वह लिखते हैं कि “पाश उन थोड़े कवियों में से एक हैं जिन्हें लोहे का गहरा एहसास है जैसा कि ‘लोहा’ शीर्षक कविता कहती है-

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सरापा कवि

तुम लोहे की कार में घूमते हो
मेरे पास लोहे की बंदूक है
मैंने लोहा खाया है
तुम लोहे की बात करते हो


लोहा केदारनाथ अग्रवाल ने भी ‘देखा’ था। धूमिल को भी लोहे का ‘स्वाद’ मालूम था। लेकिन पाश ने तो लोहा ‘खाया’ था और उसकी ‘अंतड़ियों में गड़ी हुई थीं/ रंगों और रहस्यों वाली विचित्र कविता की किरचें’। इसलिए कुल मिलाकर था वह कवि ही - सरापा कवि। ऐसा समझदार कवि जिसे उस जगह का पता था ‘जहां कविता ख़त्म होती है’ और उस जगह का भी ‘जहां कविता ख़त्म नहीं होती’।"

साभार- बीच का रास्ता नहीं होता
राजकमल प्रकाशन 
8 वर्ष पहले
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