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सबसे पहली मस्नवी पतंग पर कही थी ग़ालिब ने, यहां पढ़ें कुछ शेर

दीपाली अग्रवाल

Mud Mud Ke Dekhta Hu
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मिर्ज़ा ग़ालिब के नाम से कौन बेख़बर होगा, उन्होंने उर्दू-फ़ारसी अदब को नए आयाम दिए हैं। पीढ़ियों ने मिर्ज़ा ग़ालिब से सीखा है और लिखा है। मिर्ज़ा का जन्म 1797 को आगरा में हुआ था और उन्होंने 1807-08 में शेर भी कहना शुरु कर दिया था।


उनकी अब तक मिली शाइरी के अनुसार, उन्होंने सबसे पहले पतंग पर मस्नवी कही थी जिसे 1812 की रचना बताया जाता है।

उसी मस्नवी के कुछ शेर यूं हैं

ये जो महफ़िल में बढ़ाते हैं तुझे
भूल मत इस पर उड़ाते हैं तुझे

एक दिन तुझको लड़ा देंगे कहीं
मुफ़्त में नाहक़ कटा देंगे कहीं

1812-13 में मिर्ज़ा साहब दिल्ली आ गए। यहां के अदबी माहौल से उनकी रचनात्मकता को भी बहुत फ़ायदा मिला। ग़ालिब का देहांत भी दिल्ली में ही हुआ था। अपने आरम्भिक काल में मिर्ज़ा अब्दुल क़ादिर ‘बेदिल’ की फ़ारसी शाइरी और शैली से बहुत प्रभावित रहे और वह इसे स्वीकार भी करते हैं।


साभार- दीवाने-ग़ालिब
वाणी प्रकाशन
7 वर्ष पहले
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