मां के बग़ैर बचपन बिना मंज़िल का सफ़र होता है। बच्चों को इसका एहसास शायद बड़े होकर होता है। जावेद अख़्तर का बचपन भी कुछ इसी तरह का सफ़र रहा है। जावेद अख़्तर जब 8 साल के थे उनकी मां यह दुनिया छोड़कर चली गईं। जावेद उस दिन को कभी नहीं भूले जब उनकी ख़ाला उन्हें और उनके भाई को मां के जनाज़े के पास ले गई थीं। सफेद कफन में लेटी उनकी मां का चेहरा खुला था और उनकी ख़ाला ने कहा बच्चों आख़िरी बार अपनी मां को देख लो। इसके बाद उनकी ख़ाला ने कहा कि इनसे वादा करो जावेद कि तुम बड़े होकर कुछ बनोगे। इस पूरे वाक़या का ज़िक्र जावेद अख़्तर ने अपनी किताब तरकश में किया है।
वो अपने संघर्ष के दिनों के बारें लिखते हैं कि मैंने एक कदम उठा तो लिया था मगर घर से निकल के कई बरसों के लिए मेरी जिंदगी कटी उम्र होटलों में मरे अस्पताल जाकर जैसी हो गई। शराब पहले भी बहुत पीता था मगर फिर बहुत ज्यादा पीने लगा। ये मेरी जिंदगी का एक दौर है जिस पर मैं शर्मिंदा हूं। इन चंद बरसों में अगर दूसरों ने मुझे बर्दाश्त कर लिया तो ये उनका एहसान है। बहुत मुमकिन था कि मैं यूं ही शराब पीते-पीते मर जाता मगर एक सबेरे किसी की बात ने ऐसा छू लिया कि उस दिन से मैंने शराब को हाथ नहीं लगाया और न कभी लगाऊंगा।
आज इतने बरसों बाद अपनी ज़िंदगी को देखता हूं तो लगता है कि पहाड़ों से झरने की तरह उतरती, चटानों से टकराती, पत्थरों में अपना रास्ता ढूंढती, उमड़ती, बलखाती, अनगिनत भंवर बनाती, तेज़ चलती और अपने ही किनारों को काटती हुई ये नदी अब मैदानों में आकर शांत और गहरी हो गई है।
मेरे बच्चे ज़ोया और फ़रहान बड़े हो गए हैं और बाहर की दुनिया में अपना पहला क़दम रखने को हैं। उनकी चमकती हुई आंखों में आनेवाले कल के हसीन ख़्वाब हैं। सलमान, मेरा छोटा भाई, अमेरिका में एक कामयाब साइकोएनालिस्ट, बहुत-सी किताबों का लेखक, बहुत अच्छा शायर, एक मोहब्बत करने वाली बीवी का पति और दो बहुत ज़हीन बच्चों का बाप है। ज़िंदगी के रास्ते उसके लिए कुछ कम कठिन नहीं थे मगर उसने अपनी अनथक मेहनत और लगन से अपनी हर मंज़िल पा ली है और आज भी आगे बढ़ रहा है। मैं ख़ुश हूं और शबाना भी, जो सिर्फ़ मेरी बीवी नहीं मेरी महबूबा भी है। जो एक ख़ूबसूरत दिल भी है और एक क़ीमती ज़हन भी। “मैं जिस दुनिया में रहता हूं वो उस दुनिया की औरत है” – ये पंक्ति अगर बरसों पहले ‘मजाज़’ ने किसी के लिए न लिखी होती तो मैं शबाना के लिए लिखता।
आज यूं तो ज़िंदगी मुझ पर हर तरह से मेहरबान है मगर बचपन का वो एक दिन, 18 जनवरी 1953 अब भी याद आता है। जगह, लखनऊ, मेरे नाना का घर- रोती हुई मेरी ख़ाला, मेरे छोटे भाई सलमान को, जिसकी उम्र साढ़े छह बरस है और मुझे हाथ पकड़ के घर के उस बड़े कमरे में ले जाती है जहां फ़र्श पर बहुत सी औरतें बैठी हैं।
तख़्त पर सफेद कफन में लेटी मेरी मां का चेहरा खुला है। सिरहाने बैठी मेरी बूढ़ी नानी थकी-थकी सी हौले-हौले रो रही हैं। दो औरतें उन्हें संभाल रही हैं। मेरी ख़ाला हम दोनों बच्चों को उस तख़्त के पास ले जाती हैं और कहती हैं, अपनी मां को आखिरी बार देख लो। मैं कल ही आठ बरस का हुआ था। समझदार हूं। जानता हूं मौत क्या होती है। मैं अपनी मां के चेहरे को बहुत गौर से देखता हूं कि अच्छी तरह याद हो जाए। मेरी खाला कह रही हैं इनसे वादा करो कि तुम जिंदगी में कुछ बनोगे, इनसे वादा करो कि तुम जिंदगी में कुछ करोगे। मैं कुछ कह नहीं पाता, बस देखता रहता हूं और फिर कोई औरत मेरी मां के चेहरे पर कफ़न ओढ़ा देती है
ऐसा तो नहीं है कि मैंने जिंदगी में कुछ किया ही नहीं है लेकिन फिर ये ख़्याल आता है कि मैं जितना कर सकता हूं उसका तो एक चौथाई भी अब तक नहीं किया और इस ख़्याल की दी हुई बेचैनी जाती नहीं।
(जावेद अख़्तर की किताब तरकश का एक अंश)
9 वर्ष पहले