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गीत में उठे सवाल तो चुभते हैं लेकिन जवाब उम्मीद भी जगाते हैं...

काव्य डेस्क

Mere Azeez Filmi Nagme
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                                                  हमने सुना था एक है भारत, सब मुल्कों से नेक है भारत 
लेकिन जब नजदीक से देखा सोच समझ कर ठीक से देखा


ये गीत 1959 में बनी फिल्म 'दीदी' का है। यह वह दौर था जब हमारा देश आजाद होने के बाद एक आकार ले रहा था लेकिन विभाजन के दर्द से कराह भी रहा था।  

फिल्म में गीत का सीन है- क्लासरूम में बच्चे अपने अध्यापक यानि गुजरे जमाने के मशहूर अभिनेता सुनील दत्त साहब से गीत के माध्यम से सवाल कर रहे हैं।
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एक से एक की बात जुदा है

बच्चे सवाल इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उन्हें शक है कि जो कुछ उन्हें पढ़ाया गया है वह कोई अफ़साना था जबकि हक़ीकत कुछ और है। 

बच्चों के इन सवालों और दत्त साहब के जवाबों के कलमकार थे साहिर लुधियानवी। गीत गाया, मखमली आवाज के जादूगर मोहम्मद रफी और खनकती स्वरों की मल्लिका आशा भोंसले ने।   

हमने नक्शे और ही पाए, बदले हुए सब तौर ही पाए
एक से एक की बात जुदा है, धर्म जुदा है जात जुदा है
आप ने जो कुछ हम को पढ़ाया, वह तो कही भी नज़र न आया 

यह वह दौर था जब गुलामी की जकड़बंदियों से मुक्त हुआ 'राष्ट्र' आकार ले रहा था, मुसीबतें सर पर नाच रहीं थीं, आर्थिक विपन्नता मुंह बाये खड़ी थी, सरकार को वक्त चाहिए था। इन नाजुक परिस्थितियों में चुनौतियां कठिन और चौतरफा थीं। 

यह गीत उन्हीं परिस्थितियों की तरफ इशारा कर रहा है। यह तब की बात थी लेकिन गीत में उठाए गये सवाल आज भी मौजूं हैं।

जो कुछ मैंने तुम को पढ़ाया, उसमें कुछ भी झूठ नहीं

तमाम चुभते हुए सवालों के बावजूद गीत की तरह ही हमारा 'मुल्क' उम्मीद का दामन थामें कुछ कर्मयोगियों के प्रयासों का नतीजा है। बेहतरी के लिए उठे हर आंदोलनों में संभव है कि अराजकता के बीज भी छुपे हुए हों।

ऐसा होता आया है, इसीलिए दत्त साहब जब गीत में बच्चों द्वारा उठाये गये सवालों का जवाब देते हैं तो कहते हैं-   

         जो कुछ मैंने तुम को पढ़ाया, उसमें कुछ भी झूठ नहीं
          भाषा से भाषा न मिले तो इसका मतलब फूट नहीं
          इक डाली पर रह कर जब फूल जुदा है पात जुदा
          बुरा नहीं गर यूं ही वतन में धर्म जुदा हो जात जुदा 

सदियों तक इस देश में बच्चों रही हुकूमत गैरों की

गीत के किरदार यानि बच्चे, देश में होने वाले धार्मिक मनमुटाव, जाति व्यवस्था के दंश, अमीर-गरीब की खाईं से लेकर बुनियादी ढांचों तक पर सवाल उठाते हैं।  

वही है जब कुरआन का कहना, जो है वेद-पुरान का कहना
 फिर ये शोर-शराबा क्यों है, इतना खून-खराबा क्यों है ?


अध्यापक (सुनील दत्त) गीत के लहजे में ही जवाब भी देते हैं लेकिन सोचने वाली बात यह है कि वह स्कूल टीचर डबल एम.ए., पीएच.डी होकर भी 7 वीं कक्षा के बच्चों को पढ़ाता है। 

          सदियों तक इस देश में बच्चों रही हुकूमत गैरों की
          अभी तलक हम सबके मुंह पर धूल है उनके पैरों की,
          लड़वाओ और राज करो, यह उन लोगों की हिकमत थी
          उन लोगों की चाल में आना हम लोगों की जिल्लत  थी,
          यह जो बैर है इक दूजे से यह जो फूट और रंजिश है
          उन्हीं विदेशी आकाओं की सोची समझी बख़्शिश  है 

करम से बढ़कर  किसी मनुष्य की कोई भी पहचान नहीं 

चूंकि देश लंबे समय तक विदेशी हुकूमत की जकड़बंदियों में था इसलिए गीतकार लंबी गुलामी के पदचिन्हों की न सिर्फ पहचान करता है बल्कि उन प्रभावों को भी बड़ी मजबूती
से दर्ज करता है। 

ऐसा इसलिए है क्योंकि जिन्होंने आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया या उस दौर को समझा, उनका मानना था कि सारी बुराइयां अंग्रेजों की वजह से ही उत्पन्न हुईं हैं। यही इस गीत की विशेषता भी है, और वजह भी। वजह इस अर्थ में कि गीत उम्मीद जगाता है। 

कुछ इन्सान ब्राह्मन क्यों है, कुछ इंसान हरिजन क्यों हैं,
एक की इतनी इज्जत क्यों है, एक की इतनी ज़िल्लत क्यों है ?

धन और ज्ञान को ताकत वालों ने अपनी जागीर कहा
मेहनत और गुलामी को कमजोरों की तक़दीर कहा,
इन्सानों का ये बंटवारा वहशत और जहालत है
जो नफ़रत की शिक्षा दे वह धर्म नहीं है, लानत है,
      जन्म  से कोई नीच नहीं है, जन्म  से कोई  महान  नहीं
      करम से बढ़कर  किसी मनुष्य की कोई भी पहचान नहीं 

ऊंचे महल बनाने वाले फुटपाथों पर क्यों नहीं रहते हैं

गीत अपने जवाब में जातिगत ढ़ांचे की परंपरागत मानसिकता को खंडित करता है, जन्म आधारित उच्चता को नकारता है और कर्म की श्रेष्ठता और संभावनाओं को स्थापित करता है।  

ऊंचे महल बनाने वाले फुटपाथों पर क्यों नहीं रहते हैं,
दिन भर मेहनत करने वाले फाकों का दुख क्यों सहते है ?

 
गीत अपने आप में गहरे सामाजिक बहसों को समेटे हुए है। कलमकार, पूंजीवादी व्यवस्था से उत्पन्न होनेवाले दुष्परिणामों की तरफ साफ इशारा तो करता है, साथ ही सुधार की
उम्मीद भी करता है।

खेतों और मिलों पर अब तक धन वालों का इजारा है

आजादी का स्वप्न देखने वाले नेतृत्वकर्त्ताओं ने भविष्य के जिस भारत की कल्पना की थी, यह गीत उस आने वाले कल की आभासी तस्वीर पेश करता है। 

खेतों और मिलों पर अब तक धन वालों का इजारा है
हमको अपना देश प्यारा, उन्हें मुनाफा प्यारा है,
उनके राज में बनती है हर चीज़ तिजारत की खातिर
अपने राज में बना करेगी सब की जरूरत की खातिर,


जिस समय में यह फिल्म बनी और गीत लिखा गया उस समय भूख और बेकारी मूलभूत चुनौतियां थीं लेकिन हम देखते हैं कि देश उस दौर से काफी आगे निकल गया है लेकिन
समस्याएं जस की तस हैं।  

लोग गरीबी के उस दलदल में आज भी धंसे पड़े हैं और आंकड़ा दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। 

अब तो देश में आज़ादी है अब क्यों जनता फरियादी है

शहर बने, उद्योग लगे, लोग शिक्षित हुए, बदलाव हुए हैं लेकिन फिर भी वो स्वप्न जो स्वतंत्रता संग्राम के उन महान सेनानियों ने देखे थे, उसे पाना अभी बाकी है। 

कट्टरपंथी सोच वाले जातिगत संकीर्णता, अमीरी-गरीबी और नफरत की उस मोटी चादर को फैलाने की कोशिश आज भी करते हैं। इसीलिए ऐसे कालजयी गीत उम्मीद जगाते हैं, ताकत देते हैं, यही कारण है कि इसकी प्रासंगिकता हमेशा बनी रहेगी।   

अब तो देश में आज़ादी है अब क्यों जनता फरियादी है,
कब जएगा दौर पुराना, कब आएगा नया जमाना ?

सदियों की भूख और बेकारी क्या इक दिन में जाएगी,
इस उजड़े गुलशन पर रंगत आते-आते आएगी,
ये जो नये मनसूबे हैं ये जो नई तामीरे हैं 
आने वाली दौर की कुछ धुंधली-धुंधली तस्वीरें हैं,
तुम ही रंग भरोगे इनमें तुम ही इन्हें चमकाओगे
नवयुग आप नहीं आएगा नवयुग को तुम लाओगे । 

एक वर्ष पहले
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