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कैफ़ी आज़मी से लेकर तनिष्क बागची तक कितना बदला ‘चलते-चलते’

काव्य डेस्क

Mere Azeez Filmi Nagme
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ये चेहरे इश्क ना जाने
ये परदे हटा देती है
जहां दिल का है ठिकाना
ये राहें बता देती है
मुसाफ़िर मैं हूँ फिर भी
मंजिल पास तू है
चलूँ मैं जिस राह पर
तू है वहां


यह गाना हालिया रिलीज़ फ़िल्म ‘मित्रों’ का है, कुछ ही वक़्त पहले अचानक यह गाना मेरे कानों में पड़ा, सुनकर लगा कि तनिष्क बागची ने यह गाना लिखा भी ख़ूब है और इसे संगीतबद्ध भी ख़ूब किया है और आतिफ़ की आवाज़ इसे और भी मजबूत बनाती है कि तभी आगे की लाइन कान में पड़ी।

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चलते चलते..

चलते चलते..
चलते चलते..
यूँ ही कोई मिल गया था
यूँ ही कोई मिल गया था
सर-ए-राह चलते चलते

तब 1971 की फ़िल्म पाकीजा का गाना ‘चलते-चलते’ याद हो आया, जिसे ग़ुलाम मोहम्मद के संगीत पर कैफ़ी आज़मी ने लिखा है और इसे लता मंगेशकर ने गाया है।

पाकीजा का चलते-चलते मेरे पसंदीदा नग़्मों में से एक रहा है जिसे अक्सर दोस्तों के साथ तो कभी अकेले में भी मैंने गुनगुनाया है। इस गाने में मीना कुमारी मानो दिल ही ले जाती हैं। मुजरे की विधा में फ़िल्माया गया यह गीत जिसके बोल और पायल की झंकार पर मन झंकृत होने लगता है।

वहीँ थम के रह गयी है, मेरी रात ढलते ढलते

चलते चलते यूँ ही कोई मिल गया था
सरे राह चलते चलते
वहीँ थम के रह गयी है, मेरी रात ढलते ढलते

(पहली नज़र के प्रेम को दिखाता यह गीत जिस पर रात ही क्या दिल भी ठहर गया है)

कैफ़ी के पूरे बोल

जो कही गई ना मुझसे, वो ज़माना कह रहा है
के फ़साना बन गयी है, मेरी बात चलते चलते
यूँ ही कोई मिल...

शब-ए-इंतज़ार आखिर, कभी होगी मुख़्तसर भी
ये चिराग बुझ रहे हैं, मेरे साथ जलते जलते
यूँ ही कोई मिल…

तनिष्क बागची के पूरे बोल

तनिष्क बागची के पूरे बोल

ये चेहरे इश्क ना जाने
ये परदे हटा देती है
जहां दिल का है ठिकाना
ये राहें बता देती है

मुसाफ़िर मैं हूँ फिर भी
मंजिल पास तू है
चलूँ मैं जिस राह पर
तू है वहाँ

चलते चलते..
चलते चलते..
यूँ ही कोई मिल गया था
यूँ ही कोई मिल गया था
सर-ए-राह चलते चलते

वो वो..

तुमसे मिला जो पहली दफ़ा
आँखों को सुकून मिला
करीब मेरे तू जो हुआ
सफ़र को कारवां मिला

तू मेरे पास है फिर भी
बस इक बात तो है
चलें दो सांसें अलग पर
इक है वजह

चलते चलते..
चलते चलते..
यूँ ही कोई मिल गया था
यूँ ही कोई मिल गया था
सर-ए-राह चलते चलते
सर-ए-राह चलते चलते..

 

इन दोनों को ही गीतों के...

इन दोनों ही गीतों के सिर्फ़ मुखड़े मिलते हैं, बाकी का पूरा गीत बिल्कुल अलग है, बात चाहें अनुभुति की हो या गीत के बोलों की। दोनों ही नग़मे अपनी एक अलग तासीर रखते हैं जिसे उसी के अनुसार सुना जाना चाहिए।

इसलिए दोनों ही नग़मे मेरे पसंदीदा हैं।
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