26 सितंबर को देव आनंद साहब का जन्म हुआ था। देव आनंद साहब तो अब हमारे बीच नहीं रहे। उनकी जयंती पर उन पर फिल्माए इस यादगार नगमें का हम विश्लेषण कर रहे हैं। यह नगमा इसलिए चुना, क्योंकि देव आनंद साहब का जीवन बहुत कुछ इस गीत जैसा ही था।
ज़िंदगी का साथ कैसा होता..?? कैसी होती है जिंदगी..?? इस पर हम सभी की अपनी-अपनी अगल राय हो सकती है, क्योंकि हम सभी के लिए ज़िंदगी के अलग-अलग मायने हैं। दोस्तों कभी-कभी हम लोग अपनी जिंदगी के हालतों से भी ज़िंदगी के मायने निकालने लगते है। ज़िंदगी के इन्हीं मायनों को व्यक्त करता गीत 'मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया...' यह गीत मुझे ही नहीं हर किसी को पसंद होगा। 1961 में रिलीज़ फिल्म 'हम दोनों' में सुपरस्टार देवानंद पर यह गीत फिल्माया गया है। साहिर लुधियानवी के इस गीत में मोहम्मद रफी ने आवाज़ दी है। संगीतकार जयदेव हैं।
गीत के बोल ज़िंदगी और आदमी का रिश्ता और गहरा कर रहे हैं। गीत बताता है कि गहरी सोच और धैर्य जिंदगी को आदमी के ऊपर हावी नहीं होने देते। हर फिक्र को धुएं में उड़ाने वाले इस गीत में साहिर ने एक तरह से अपना जीवन दर्शन व्यक्त किया है। साहिर ने ज़िंदगी को कभी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया।
मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया
हर फ़िक्र को धुएं में उड़ाता चला गया
गीत में ज़िंदगी के उन सभी हालातों को बयां किया गया, जब-जब जिंदगी आदमी को उलझन में फंसाती है। कभी अपनी तो कभी अजनबी सी नजर आती है। गीत में देवानंद जिंदगी की सभी खुशियों और गमों को अपनी सिगरेट से जोड़ते हए ज़िंदगी के कई मायने बताते हैं। इसलिए गीत में वह कहते हैं कि जिंदगी की हर फिक्र को उन्होंने धुएं में उड़ा दिया। वह आगे की पंक्तियों में कहते हैं कि वह जिंदगी में बर्बादी का रोना नहीं रोते बल्कि वह बर्बादियों का जश्न मनाते चले जाते हैं। सच ज़िंदगी का यही दर्शन होना चाहिए।
बरबादियों का सोग़ मनाना फ़िज़ूल था
बरबादियों का जश्न मनाता चला गया
मैं ज़िंदगी...
दोस्तों जिंदगी कहने को बहुत छोटा शब्द है मगर पल-पल में बदलती इस ज़िंदगी के मायने भी पल-पल में बदलते रहते हैं। कभी ज़िंदगी में इतनी खुशियां होती हैं कि गम कैसा होता है, इसका इल्म भी नहीं होता है। मगर उसी जिंदगी पर जब गम के बादल आने लगते हैं तो हम लोग निराश हो जाते हैं। जिंदगी को कोसते हुए इसके कई और मायने निकालने लगते है। मगर जिंदादिल इंसान वही होता है जो बरबादियों या यूं कहें कि जिंदगी के सभी गमों के बीच भी खुशियां ढूंढ ले। और हर लम्हे के जश्न के साथ जिंदगी जिये।
मुकद्दर से ज्यादा और कम किसी को नहीं मिलता
देव आनंदPC: mr. and misses classic bollywood revis.
जो मिल गया उसी को मुक़द्दर समझ लिया
जो खो गया मैं उसको भुलाता चला गया
मैं ज़िंदगी...
इस अल्फाज में बहुत बड़ी बात कही गई है। 'जो मिल गया उसी को मुकद्दर समझ लिया' जी हां दोस्तों ये अल्फ़ाज हम सभी की ज़िंदगी का सबसे बड़ा सच है। इसके लिए एक कहावत भी है कि मुकद्दर से ज्यादा और मुकद्दर से कम किसी को नहीं मिलता। और कहीं न कहीं हम सब भी इस बात को अच्छी तरह समझते हैं। मगर हम फिर भी किसी ऐसी चीज को पाने की जद्दोजहद में लगे रहते है जो हमारी किस्मत में ही नहीं है। इसी को समझाते हुए गीत में कहा गया है कि 'जो मिल गया उसी को मुक़द्दर समझ लिया, जो खो गया मैं उसको भुलाता चला गया'। पंक्तियां बताती हैं कि ऐसी सोच जीवन को हल्का कर देती है।
ग़म और खुशी में फ़र्क न महसूस हो जहां
मैं दिल को उस मुक़ाम पे लाता चला गया
मैं ज़िंदगी...
'ग़म और खुशी' ये दो शब्द हर किसी की ज़िंदगी से जुड़े होते हैं। खुशियां तो जिंदगी के हसीन पलों की होती है। मगर गम कभी-कभी हम सभी को बेहद कमजोर कर देता है। इसका ज़िंदगी पर इतना गहरा असर पड़ता है कि हम उस गम से उबरने की लाख कोशिशें करते हैं मगर नाकाम सा महसूस करते हैं। मगर कुछ लोग, कुछ शख्सियत ऐसी भी होती हैं जो हर हालतों में जिंदगी के गमों से जीत जाते हैं। और खुद को ज़िंदगी के ऐसे मुकाम पर ले जाते है जहां पर ग़म और खुशी में कोई फ़र्क नजर नहीं आता है। अंतिम पंक्तियां यहीं समझाने की कोशिश करती हैं कि जिंदगी को गम और खुशी का पुलिंदा मान लो। यह सोच लो जो खुश होगा उसे समय पर रोना भी पड़ सकता है। इसके लिए हमेशा तैयार रहो। गम और ख़ुशी को समान समझो।
7 वर्ष पहले