सखी सईंया तो खूब ही कमात है
महंगाई डायन खाये जात है
फिल्म ‘पीपली लाइव’ का यह गीत काफी लोकप्रिय हुआ था। इस गीत के माध्यम से एक प्रमुख सामाजिक-आर्थिक समस्या 'महंगाई' की ओर ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया गया है।
अगर हम यह कहें कि देश में महंगाई और रोजगार जैसे मुद्दों पर जनता में लामबंदी बहुत कम देखी जाती है, लोग सड़कों पर नहीं उतरते तो मान लीजिए कि यह सरकारों का सौभाग्य है। असल में यही देश का दुर्भाग्य भी है।
सरकारें एक-दूसरे को कोसती रह जाती हैं। कोई कहता है पुराने दिन ही भले थे, कोई अच्छे दिन की ढांढस बंधाता रह जाता है। लेकिन समस्या जत की तस मुंह बाय़े खड़ी है।
इससे महंगाई के दौर में सत्ताधीशों को मौका मिल जाता है और उन पर कोई दबाव नहीं बन पाता। जिन आंखों में भविष्य के सुनहरे सपने रहने चाहिए, उनमें हताशा और निराशा देखने को मिलती है। बेरहम भूख, लोगों की जरूरतों के मद्दे नजर होने वाले कोशिशों को दो जून की रोटी तक समेट देती है। फिल्म 'पिपली लाइव' का यह गीत देश के ऐसे ही कमजोर लोगों के मन में उभरते हुए दर्द की अभिव्यक्ति है।
हर महीना उछलै पेटरोल, डीजल का भी बढ़ गया मोल
शक्कर का भी बढ़ गया मोल
उसमें बासमती चावल धान मारी जात है
महंगाई डायन खाए जात है
फिल्म 'पिपली लाइव' के इस गीत को गाया था फिल्म और थियेटर की दुनिया के जाने-माने अभिनेता रघुवीर यादव ने। महंगाई की मार से कराहते लोग गीत में अपने दर्द का सामाजिक उपचार खोज लेते हैं और उन तकलीफों का एहसास ही ऐसे गीतों को जन्म देता है।
सोयाबीन का हाल बेहाल गर्म से पिच्के हैं गाल
गिर गए पत्ते पक गए बाल
अरे सोयाबीन का हाल बेहाल, गर्म से पिच्के हैं गाल
गिर गए पत्ते पक गए बाल
और मक्का जी भी खाए गई मात है
महंगाई डायन खाये जात है
हम दुनिया के सबसे तेज उभरती हुई अर्थव्यवस्था का दंभ भरने से चूकते नहीं लेकिन इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि दिन ब दिन किसानों की समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। गीत में पानी के अभाव में सोयाबीन की चौपट हुई खेती का प्रसंग है।
अरे कद्दू की हो गई भरमार, ककड़ी ने कर गई हाहाकार
मटर भी तो लगो प्रसाद
और आगे का कहूँ कहीं नहीं जात है
महंगाई डायन खाये जात है
हम ऐसे समय में जी रहे हैं कि हो न हो आने वाले समय में सब्जियों के स्वाद भी कृत्रिम रूप से बने फ्लेवर्स बाजार में मिलने लगें। खेती के नाम का झुनझुना तो खूब बजता है लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही है।
हमने शहर बनाये, सड़कें बनाईं, आलीशान बिल्डिंगें बनाईं और कहना न होगा कि तकनीकी रूप से भी उन्नत हुए लेकिन इसे देश का दुर्भाग्य ही समझा जायेगा कि देश के शैक्षणिक संस्थान अभी तक ऐसी कोई पद्धति नहीं विकसित कर पाये हैं जिससे किसानों का भला हो।
ऐ सैयां ऐ सैयां रे
मोरे सैयां रे खूब कामय सैयां जी
अरे कमा कमा के मर गए सैयां
पहले तगड़े तगड़े थे अब दुबले पतले हो गए सैयां
अरे कमा कमा के मर गए सैयां
मोटे सैयां पतले सैयां
अरे सैयां मर गए हमारे ईसी आये गए में
महंगाई डायन खाये जात है
इस गीत में पहली बार अभिनेता रघुवीर यादव की गायन क्षमता उभरकर सामने आई थी। गीत में लय है, सुर है और दृश्य तो एकदम से गवईं है। जहां समस्यायें मुंह बाये चौतरफा खड़ी हैं। लेकिन अब महज गीत भर नहीं रह गया है, इसमें सच्चाई की तस्वीर साफ-साफ दिखाई देती है।
सखी सईंया तो खूब ही कमात हैं
महंगाई डायन खाये जात है
सखी सईंया तो खूब ही कमात हैं
महंगाई डायन खाये जात है
महंगाई डायन खाये जात है
8 वर्ष पहले