एक जैसे नहीं होते हैं ज़माने वाले,
कुछ तो अपने भी निकलते हैं सताने वाले।
लब पे मीठी-सी हँसी, दिल में अदावत रखकर,
कितने मिलते हैं यहाँ प्यार जताने वाले।
वक़्त पड़ता है तो पहचान बदल लेते हैं,
रंग कितने हैं यहाँ चेहरे दिखाने वाले।
प्यार की राह में चलना कोई आसान नहीं,
लोग मिलते हैं बहुत आग लगाने वाले।
दर्द जब हद से गुज़रा तो क़लम बोल उठी,
बन गए शेर मेरे दिल को सुनाने वाले।
अपनी ग़ैरत का सदा हमने रखा है परचम,
हम नहीं हैं कभी ईमान गँवाने वाले।
दिल के रिश्तों की हिफ़ाज़त भी ज़रूरी है बहुत,
चन्द मिलते हैं यहाँ साथ निभाने वाले।
चंद सिक्कों में गवारा है जिन्हें बिक जाना,
क्या समझेंगे वो उसूलों को बचाने वाले।
जो अँधेरों से लड़ें, शम्अ जलाएँ हर सू,
वो कहाँ रोज़ मिला करते, ज़माने वाले।
दुश्मनी करके भी कुछ लोग वफ़ा कर जाते,
और कुछ दोस्त ही निकले हैं रुलाने वाले।
ऐ ज़फ़र नाज़ करें ख़ुद पे भला हम कैसे,
हम से शायर हैं बहुत होश उड़ाने वाले।
-ज़फ़रुद्दीन ज़फ़र