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देवता करने को

Zafaruddin Zafar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अपने हाथों से अपना मुकद्दर तराशता हूँ,
        
                                                    
                            
देवता करने को एक पत्थर तराशता हूँ ।

चिलचिलाती धूप हो या गर्मियां या सर्दियां,
कोई भी मौसम हो मगर घर तराशता हूँ ।

हसरतों से जा के कह दो फुर्सत नहीं अभी,
नींदों से कह दो ख़्वाबों के दर तराशता हूं ।

नफ़रत ने जो प्यारा शहर जंगल बना दिया,
मिलती है जब भी फुर्सत खंज़र तराशता हूं।

डर है कि कोई मुझ पर फतवा ना लगा दे,
आलिमों की भीड़ में एक रहबर तराशता हूं।

अब मज़हबों के बीच में जो पड़ गयीं दरारें,
भरने को ख़ुशबू फूलों के लश्कर तराशता हूँ।

मेरी प्यास को किसी का अहसान नहीं लेना,
'ज़फ़र"शबनम से कह दो समन्दर तराशता हूँ।

-ज़फ़रुद्दीन "ज़फ़र"
एफ़-413,
कड़कड़डूमा कोर्ट, दिल्ली

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6 वर्ष पहले
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