जब से खड़ी हुई दीवारें, बाबर की कुछ ईंटों से,
छिप गया था रामरत्न, अयोध्या के तीर्थों से।
शिला पे जहाँ शिशु राम हँसे थे,
वहाँ वीरानों की साँसें कसें थे।
मंदिर गिरा, पर आस्था टिकी रही,
हर दीप बुझा, पर लौ एक जली रही।
पीढ़ियाँ बीतीं, दुःख सहा जन-जन ने,
फिर भी जय श्रीराम गूँजा मन-तन ने।
कभी न्याय की चौखट पे दस्तक थी,
कभी कारसेवक की नम आँखों में चमक थी।
कभी खून से लिखी एक याचना थी,
कभी शिलाओं पे उकेरी श्रद्धा की भावना थी।
फिर आया दिन, जब धरा मुस्काई,
राम लला अपने भवन में पुनः विराजे – पूर्ण सच्चाई।
ईंट-ईंट में लहराया प्रेम, श्रम, इतिहास,
हर शिल्पन में दिखा तपस्वियों का विश्वास।
यह मंदिर नहीं, युगों की पुकार है,
यह गर्भगृह नहीं — भारत की आत्मा का द्वार है।
अब अयोध्या फिर गाए वह मीरा-सा भजन,
"जहाँ राम हैं, वहीं है मेरा जीवन।"
-युवराज सिंह कान्हवंशी