विज्ञापन

ये अंधेरे

Yunush khan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ये अंधेरे, ये गर्द-ओ-गुबार राहों के।
        
                                                    
                            
अब चुभते ही नहीं , खार राहों के।।

ता-हद-ए-निगाह, ख़ामोशी है , तो।
बुलाता है कौन , उस पार राहों के।।

हर शजर एक सायबान था , फिर।
काट दिये किसने, चिनार राहों के।।

ये दर-दरीचे घर के मुंतजिर हैं तेरे।
मुद्दतों से बंद पड़े हैं , द्वार राहों के।।

पुरवाई झोंकों ने बुझा दिये हैं जो।
जलाये थे दिये, कई बार राहों के।।

वफ़ा करते-करते, क्यूं बेवफा हुए।
पूछते हैं हमसे , ये मज़ार राहों के।।
-यूनुस खान
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manju Sharma

3563 कविताएं

View Profile