दुनिया के हर रिश्तों पर है भारी बेटी
दुख सुख में देती है साथ हमारी बेटी
अम्मा की गोदी में जब वो हंसती है
लगती है सचमुच गुलाब की क्यारी बेटी
नींद उड़ाती है बाबुल के आंखों की
जब घर में होती है कोई कुंवारी बेटी
उसको नौ दिन बाद विसर्जित होना है
नव दुर्गा पर रोपी हुई जवारी बेटी
सारा घर त्योहार मनाता है उस दिन
जिस दिन अपने मैके आती प्यारी बेटी
डोरा देह कटोरा सी उसकी आंखें
पूनम के चंदा सी लगती न्यारी बेटी
गम का बड़ा समंदर वह पी जाती है
अपनों के अत्याचारों से हारी बेटी
अम्मा से सारा दुख साझा करती है
नहीं छुपाती है अपनी लाचारी बेटी
जब उसके पावन सतीत्व पर वार हुआ
बन जाती है जौहर की चिनगारी बेटी
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