हमसे ना पूछ,हमने कैसे गुज़ारे हैं रात-दिन।
मुसलसल, ग़म-ए-हिज़्र के मारे हैं रात-दिन।।
तुम तो, तर्क-ए-ताल्लुक़ करके चले गये हो।
हमने तन्हा ही,तन्हाई से संवारे हैं रात-दिन।।
कभी , शाम-ओ-सहर सजती थी महफ़िलें।
मगर,आज क्यूं वीरानों के मारे हैं रात-दिन।।
वक्त के साथ हमने,यही सीखा है वक्त से।
दरिया-ए-वक्त के , दो किनारे हैं रात-दिन।।
शब-ए-ग़म मुख्तसर हुई , सहर-ए-ग़म हुई।
मुश्किल से,मुश्किलों से उबारे हैं रात-दिन।।
उदासियों के चिरागों से, उजाले क्या होंगे।
दरम्यां है कुरबत, तो उजियारे हैं रात-दिन।।
ये अश्क गिरने से पहले,जब पोंछ दें कोई।
तब समझ लेना , चांद-सितारे हैं रात-दिन।।
-यूनुस खान