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ताज़गी के अहसास से , सराबोर थी।

Yunush khan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ग़म-ए-हिज़्र से और निखरी है ग़ज़ल।
        
                                                    
                            
सिमटते-सिमटते यूं बिखरी है ग़ज़ल।।

ताज़गी के अहसास से , सराबोर थी।
जब किसी हद से गुज़री है ये ग़ज़ल।।
-यूनुस खान
15 घंटे पहले
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