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कब तक

Yunush khan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अश्कों से भीगे जख़्म,छुपाऊं कब तक।
        
                                                    
                            
इस हाल में खुश नजर,आऊं कब तक।।

सोते जुगनुओं को अब,जगाना ही होगा।
उजालों के लिए,दिल जलाऊं कब तक।।

मेरे चेहरे की इबारत , पढ़ने लगे हैं लोग।
दोस्तों के दरम्यां, झूठ चलाऊं कब तक।।

एक मुद्दत से कैद हूं, मैं रस्मों की हद में।
आजाद हूं , खुद से ये बताऊं कब तक।।

ख़ामोशियों में मुझे, आवाज दी किसने।
साये को साथ अपने, जगाऊं कब तक।।
-यूनुस खान
एक महीने पहले
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